हम जिन्दा हैं
जिन्दा लाश होकर नहीं
सपनों की मौत
हमारी मौत है नहीं
ठगी का शिकार लाठी
क्या हो गयी
हमारी मौत हो गयी
ऐसा तो नहीं
जीने की ललक जिन्दा होनी चाहिए
जिन्दा लाश होकर नहीं
सपने बुनने लगे हैं
हम भी नये…………….
जीने के लिये क्या चाहिए….?
सपने……….और सपने
 विश्वास के साथ
सन्तोष की सांस
शरीर उम्र की शिकार होगी
हां अपनो के हाथों अरमानों का कत्ल
मौत ही है
ऐसी मौत से उबर सकते हैं
सपने तो बुने जा सकते है
सपनों मे हम  उलझे हैं
उलझन ही हमारी सुलझन है
सपने ही हमारे जीने के सहारे हैं
कोई डकैत सपने छिन ले
मतलब ये नहीं कि टूट गयीं उम्मीदे
नहीं……जीने की उम्मीदें बाकी रहती हैं
आखिरी सांस तक
साथी के साथ तक
सपने लूटना हैवानियत है
लूटने वालों के सपने जब
चटकर मटियामेट होने लगते है
खुदा भी हाथ नहीं लगाता
बिखर जाती है
सपने लूटने वालों की दुनिया
आओ हम जिन्दगी के हर पल का
जश्न मनायें
हमारे जिसने लूटे भूल जाओ
खुद के कर्म पर करो 
विश्वास
सपने देखते रहो जिन्दा रहने के लिए
काल के गाल पर निशां छोडऩे के लिए।

डां नन्द लाल भारती

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