#संस्मरण …वीणा वत्सल सिंह

बात उन दिनों की है जब हम मधुमुस्कान और लोटपोट पढ़ा करते थे। तब चार आने (25 पैसे) ,आठ आने(50 पैसे) का भी वैल्यू था।हमें तब स्कूल जाने से पहले रोज कुछ पैसे लेकर जाने की लत लगी हुई थी।ऐसे में कभी चार आने मिलते थे और किसी दिन आठ आने भी ; लेकिन किसी दिन अगर एक रुपया मिल गया तो हम खुद को बादशाह समझते थे 🙂 उस दिन तो फिर पॉपिंस और च्युंगम दोनों ही खरीदने के साथ मित्र – मंडली में रोब जमाने का भी स्कोप मिल जाता था।तब हमारी चार लड़कियों की चौकड़ी हुआ करती थी – मैं ,उर्मिला ,अर्चना और अनीता।क्लास की सभी शैतानियां साझा थीं।हम तब मिशनरी स्कूल में पढ़ते थे लिहाजा वहां स्कूल से लगा हुआ एक बड़ा सा चर्च भी था।जिसमें अद्भुत कलाकृतियों की पेंटिंग्स वाले कांच लगे हुए थे।एक दिन मण्डली में प्रोग्राम बना उन पेंटिंग्स को देखने का लेकिन कब देखा जाए जाकर – यह यक्ष प्रश्न था।मैं ने सुझाया क्यों न लंच आवर में चुपचाप स्कूल से निकलकर चर्च में चला जाए और आवर ख़तम होते – होते वापस आ जाएं।जाहिर है पेंटिंग्स देखने के लिए उस दिन लंच बॉक्स खोलना भी नहीं था और भूख पर विजय भी पानी थी।उर्मिला के पापा की एक शॉप थी जिसके बिस्कुट आदि भी मिलते थे।तय हुआ कि हम आठ दिनों तक अपना जेब खर्च जमा करेंगे और उर्मिला अपने पापा से मनुहार कर हमें रीजनेबल रेट में बिस्कुट के पैकेट्स दिलवाएगी ,जिसे हम अपनी क्षुधा शांत करने में युज करेंगे।
खैर एक लंच आवर में कुछ बिस्कुट के पैकेट्स और पानी की बोतल ले हम वॉच मैन को चकमा देकर चर्च तक आ गए।स्कूल से चर्च के बीच के रास्ते में बिस्कुट खा पानी – वानी पी लिया गया और चर्च के पास लगे हैंड पंप से हाथ – पैर धोकर हमने चर्च में प्रवेश किया।भगवान का घर हम अपवित्र कैसे कर सकते थे? अंदर प्रवेश के साथ ही सलीब पर टंगे ईसा मसीह को सादर भक्ति भाव से प्रणाम कर हम हरेक चित्रकारी को बारीकी से देखने लगे।ग़ज़ब की कलाकृतियां बनी थीं उन लंबी खिड़कियों के कांचों पर!तब अधिक समझ नहीं थी फिर भी हम सभी बातें करते हुए उनमें खो गए।समय का ध्यान ही नहीं रहा और जब सभी चित्रों का अवलोकन पूरा हुआ तब तक लंच के बाद का पीरियड भी आधा से अधिक निकल चुका था।स्कूल में प्रिंसिपल हमारे स्वागत के लिए अपने चेहरे को लाल – पीला किए एक बड़ा सा डंडा लेकर खड़ी थीं। डर से कांपते हुए बुरी तरह हकलाते हुए हमने उन्हें अपने गंतव्य स्थल की जानकारी दी थी तब उनके कड़कदार प्रश्न के जवाब में । पर आश्चर्य!हम उनके डंडों की आस लगाए थे और बदले में उस समय हमें उनकी तरफ से स्नेह भरी मुस्कुराहट और खूब सारा प्यार मिला था 🙂 शायद उन्हें भी हमारी शरारत अच्छी लगी थी।

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