मै अच्छी नही हूँ

मुझे महेदी लगानी नही आती ,
न ही रंगोली बनानी आती है ,
मे बंद बोतल के ढक्कन जैसी ,
मुझे दही जमानी नही आती |
न कभी व्रत की पति के लिए ,
न कभी बेटे के लिए ,
मै सब जैसी औरत नही ,
मुझे गढ़ी कहानी नही आती .
मुझे ढोल बजाना नही आता ,
न ही नाचना ,गाना आता है ,
मै अल्हड सी मस्तानी हूँ ,
कोई हुनर जमाना नही आता ,
लोगो की मे हु हँसी की पात्र ,
मुझे अंदाज़ मे रहना नही आता ,
मै बंद बोतल के ढक्कन जैसी ,
मुझे दही जमाना नही आता ,
सब कहते है भजन करो ,
पर मुझको पाप –पुण्य कमाना नही आता .
मै आल्हड सी मस्तान हूँ |

डॉ श्रुति मिश्रा

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