कविता की नदिया

(कवि: महावीर उत्तरांचली)
शब्द कहें तू न रुक भइया
कदम बढ़ाकर चल-चल-चल-चल
कविता की नदिया बहती है
करती जाए कल-कल-कल-कल
कविता की नदिया बहती है……….

काग़ज़ पर होती है खेती
हर भाषा के शब्दों की
उच्चारण हों शुद्ध यदि तो
शान बढ़े फिर अर्थों की
हिंदी-उर्दू के वृक्षों से
तोड़ रहे सब फल-फल-फल-फल
कविता की नदिया बहती है……….

अ आ इ ई के अक्षर हों
या फिर अलिफ़ बे पे ते
ए बी सी डी भी सीखेंगे
सब होनहार हैं बच्चे
उपलब्ध नेट पे आज
समस्याओं के हल-हल-हल-हल
कविता की नदिया बहती है……….

मीरो-ग़ालिब हों या फिर
हों तुलसी-सूर-कबीरा
प्रेम से उपजे हैं सारे
कहते संत “महावीरा”
बैर भूलकर आपसे में
जी लो सारे पल-पल-पल-पल
कविता की नदिया बहती है……….

***

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