रार जिंदगी से ठानूंगा

(पीठ पर कचरे का थैला लादे अनाथ बच्चे पर कविता)
सुशील शर्मा

मैं अनाथ हूँ,सड़क का बच्चा।
मन है मेरा सीधा सच्चा।
सुबह सबेरे भूख जगाती।
दिन भर मुझको वो टहलाती।
पीठ पर लादे कचरे के थैले।
कपड़े पहन कर मैले कुचैले।
रोटी तलाशने निकल पड़ा हूँ।
निपट अकेला मैं खड़ा हूँ।
नही कोई रिश्ता है मेरा।
चारों ओर है घिरा अंधेरा।
लेकिन फिर भी जीवन जीना।
सारे विष हैं मुझको पीना।
धरती बनती मेरा बिछौना।
चाँद लगाता मुझे ढिटोना।
रात सुलाती देकर लोरी।
ठंड लगाती हवा छिछोरी।
भूख से जब है पेट सुकुड़ता।
मुँह पर अपने ताले जड़ता।
कचरे के डिब्बे की रोटी।
मुझको चाँद सी लगती मोटी।
श्रम से मिली कमाई खाता।
मेरी सब कुछ भारत माता।
हार नही लेकिन मानूंगा।
रार जिंदगी से ठानूंगा।

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