संबंधों का हाल सुनाने अब कहाँ आती।
सुधियों की पाती  हाँ  सुधियों की पाती।

कच्ची   माटी   का   सोंधापन
चिंताओं  से  मुक्त  वो  बचपन
तन  की पीड़ा  मन  की  पीड़ा
विरहिणी के अँसुवन की पीड़ा
आँगन      की     तुलसी     में 
प्रतिदिन   जलती    सँझवाती।
सुधियों की पाती  हाँ  सुधियों की पाती।

सुखद चाँदनी मिलन  की  रातें
प्रीति   पगी  शबनम-सी   बातें
परदेसी     की    याद    समेटे
अनकहे       संवाद       समेटे
मेघों     की    सावनी    घटाएं
रह-रह                   तड़पाती।
सुधियों की पाती  हाँ  सुधियों की पाती।

बीते  कल  की  बात  हो  गयी
आधुनिकता  में कहीं खो गयी
बाबू  जी   का   वही    तराना
बात-बात    में   यूँ    उकताना
गृहस्थी     का    भार    उठाए
अम्मा                  झुँझलाती।
सुधियों की पाती  हाँ  सुधियों की पाती।

अमरेश सिंह भदौरिया

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