तुम्हें जाति पर अपनी गुमान हैगुमान के बारुद से तबाह 
कर देते हो अछूत का जीवन….
कभी एकांत मे शान्ति से सोचना
अछूत कौन है…..?
तुम्हारी खोपड़ी मे कुछ
ज्ञान की तरंगें उठे तो
अछूत के अस्तित्व को तलाशना
खैर तुम क्या तलाशोगे
तुम्हें तो अपना रंग पोतना आता है…..
तुम्हारे अस्तित्व को उभरे
कुल जमा साढे चार हजार साल हुए हैं
तुम दावा करते हो
अखण्ड भारत के उदभव से पहले
तुम्हारा उदभव हो गया था
झूठ और नफरत के बीज नहीं……
जाति के गुमान को त्याग दो
दुनिया बदल रही है
क्या छूत क्या अछूत सब
समझने लगे हैं
अपना अस्तित्व तलाशने लगे हैं…..
तुम्हारी जाति व्यवस्था 
देश की छाती मे खंजर है
माथे पर बदनुमा दाग
मिला लो अब हाथ
मिटा दो छूत-अछूत की आग……
छूत-अछूत की अमानवीय व्यवस्था
तुम्हारे स्वार्थ की दहकती कहानी है
तुम चाहो तो अमानवीय व्यवस्था को
ध्वस्त कर सकते हो
आदमी को आदमी से जोड़ सकते हो….
सांप नेवले जैसा अन्तर्कलह
बन्द कर दो
जातिवाद का जहर हितकर नहीं हैं
सोने की चिडिय़ा के पर नोचे जा चुके हैं
सांस बाकी है,
दुनिया तुम्हारी दी गयी जाति व्यवस्था पर
दुनिया शर्मिंदा है
क्योंकि आदमी कोई अछूत नहीं होते
तुम्हारे रचे चक्रव्यूह मे फंसे लोग 
सदियों से थक चुके हैं
दर्द ढोते ढोते…..
तोड़ दो अपनी रची जातिवाद
नफरत की दीवारें
जातिवाद साबित हो चुका नरपिशाच
बढा दो अब समानता के हाथ
तुम चलो हम भी चले साथ साथ…..
डां नन्द लाल भारती

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