मिजाजपुर्सी, लघु फिल्म, अवधि- 10 मिनट, लेखक- शशिकान्त सुशांत

मिजाजपुर्सी
लघु फिल्म, अवधि- 10 मिनट
लेखक- शशिकान्त सुशांत
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पात्र- मिसेज एंड मि. वर्मा
,, शर्मा
,, डा. गुलाटी
,, चोपड़ा
,, सिन्हा साहब
शूटिंग स्थल- खुश मिजाज सोसाइटी कांप्लेक्स का पार्क, लॉन, झूले और बेंच के अलावा पात्रों के घर।
मौसम खुशगवार है, थोड़ी सी बारिश के बाद चल रही पुरवैया लोगों को आननंदित भी कर रही है और दर्द भी दे रही है। शाम होने को है। बच्चे लॉन और पार्क में पहले से ही झूलों और खेल के अन्य साधनों पर कब्जा कर चुके हैं। कुछ क्रिकेट तो कुछ फुटबॉल और वॉलीबॉल का आनंद ले रहे हैं। बगल में कुछ बेंचें भी लगी हैं जहां बुजुर्गों का डेरा लगने वाला है। कुछ लोग जॉगिंग ट्रैक पर चहलकदमी भी करने लगे हैं। कुछ लोगों ने मौसम के मिजाज को देखते हुए टहलने से परहेज करना ही उचित समझा और बेंच पर आकर विराजमान हो चुके हैं। यह नित्य का रूटीन है। सोसाइटी वाले शाम को घर से लेकर संसार की समस्याओं के साथ अपनी अपडेटेड जानकारी का पुलिंदा लेकर आते हैं और चर्चा, विमर्श, टोकाटोकी के साथ राजनीतिक ज्ञान का भी वितरण करने से नहीं हिचकते। इस मंडली बैठक का मुख्य उद्देश्य घर की समस्याओं से ऊबे उकताये लोगों का मन-मस्तिष्क आपसी हंसी-मजाक जैसे मनोरंजक कार्यक्रमों से हल्का और रिचार्ज हो करना है, जो बुढ़ापे के लिए सबसे बड़ा टॉनिक है। चूंकि इस बैठक में बुजुर्ग अपनी पत्नियों के साथ बैठे होते हैं इसलिए बोलने से ज्यादा सुनने भी पड़ते हैं। यहां कही गई बात को कोई बुरा नहीं मानता यह इस बैठक का मुख्य नियम और शर्त है।
(इस दृश्य का फिल्मांकन कम से कम 60-75 सेकेंड तक हो, बच्चों के खेल और उसके खिलखिलाते चेहरे को दिखाना भी इस फिल्म का एक संदेश है जो बुजुर्गों को खिलखिलाने के लिए प्रेरक बनते हैं)
एपिसोड-1
दृश्य-एक
(इस दृश्य का फिल्मांकन कम से कम 75 सेकेंड तक का है।जॉगिंग करने के बाद एक-एक करके मि. शर्मा, के बाद मि. वर्मा, सिन्हा साहब और गुलाटी दंपति बेंज पर विराजमान हो रहे हैं)
वर्मा-कहिए सिन्हा साब, कैसी तबीयत है आपकी?
सिन्हा साब- इस खुशगवार मौसम में तबीयत का तो मत ही पूछिए वर्मा जी। यह तो मचल रहा है।
शर्मा- क्या बात है सिन्हा साब, आपकी जवानी हिलोरें मारने लगी हैं।
वर्मा- इस पुरवैया के दर्द भरे माहौल में जवानी का लौटना नेचुरल है वर्मा जी। आप भी महसूस कर रहे हैं लेकिन कहना नहीं चाहते।
सिन्हा साब- भाभी जी साथ में बैठी हैं तो कैसे कहेंगे।
शर्मा- नहीं वर्मा जी श्रीमती जी से डरते नहीं हैं। यह आप समझने की भूल मत कीजिए सिन्हा साब।
(डा. गुलाटी का आगमन होता है। उनके साथ उनकी पत्नी भी हैं। सभी को अभिवादन के बाद दोनों एक साथ बेंच पर विराजमान होते हैं।)
शर्मा- आज के मौसम के बारे में गुलाटीजी ज्यादा सटीक टिप्पणी कर सकते हैं।
डा. गुलाटी- कुछ शरारती अंदाज में लोगों की ओर देखकर फिर अपनी पत्नी का चेहरा पढ़कर- क्या कहें शर्मा जी। आज तो मौसम हो गया है। एक तो झमाझम बारिश ऊपर से बेदर्द पुरवैया की चाल। दोनों कातिल हैं। किसका दर्द बयां करूं शर्मा जी!
सिन्हा- क्या लाजवाब वर्णन प्रस्तुत किया है डा. साहब ने।
शर्मा- बहुत खूब डा. साहब। इसमें आपकी क्लीनिक खूब चलेगी।
गुलाटी- बुरा नहीं मानिएगा तो एक बात कहूं!
सिन्हा- कहिए न, खुलकर कहिए। यहां बुरा मानना मना है।
वर्मा- हां-हां। इस मंडली में सब कुछ माफ है, जो कहना है कहो साफ है।
गुलाटी- देखिए बारिश हो और उसमें पुरवैया बहती रहे तो इससे रोगी नहीं मनोरोगी बढ़ते हैं। और मैं मनोरोग का इलाज तो करता नहीं।
वर्मा- अगर कोई मरीज आ जाए तो?
गुलाटी- उसे सामाजिक चुटकुलों से खुश करके भेज देता हूं। इलाज के नाम पर मजाक और हंसी का कॉकटेल देता हूं मैं।
सिन्हा- क्या बात है, यह तो और भी बेहतरीन काम है।
गुलाटी- बेहतरनी तो उसके लिए होता है। मैं तो उसे अपनी राम कहानी बना बना कर सुना देता हूं। उसे लगता है कि डा. साहब तो हमसे भी बड़े मनोरोगी हैं वह खुशी-खुशी चला जाता है।
(इसी बीच एक क्रिकेट गेंद गुलाटी के पीठ पर आकर जोरदार टक्कर मारता है। आंय की आवाज के साथ गुलाटी उठ खड़े होते हैं और सभी लोग उनकी पीठ सहलाते हुए उनकी कुशल क्षेम पूछते हैं)
वर्मा- ज्यादा चोट तो नहीं लगी?
गुलाटी- अब जितनी लगनी थी उतनी तो लग चुकी है।
शर्मा- दर्द हो रहा है?
गुलाटी- नहीं-नहीं डॉक्टर को इतना दर्द महसूस कहां होता है।
शर्मा- ये बच्चे तेंदुलकर-कोहली बन न बने लेकिन गोला फेंक एथलीट तो बन ही गए हैं।
सिन्हा- जाएं तो कहां जाएं ये बच्चे खेलने के लिए? इनको भी खेलने के लिए जगह चाहिए। लेकिन इनके बारे कौन सोचता है?
वर्मा- हमारे घर की खिड़कियां-दरवाजे तो तोड़ते ही हैं अब देह भी तोड़ेंगे।
(इसके बाद सभी बुजुर्ग अपने-अपने घरों को चले जाते हैं। खाली बेंच और कुछ अंधेरे का फायदा उठाकर वहां एक प्रेमी जोड़ा पहुंचता है।)
दृश्य-2
लड़की- इधर मुंह करके बैठो। उधर से लोग आ जा रहे हैं।
लड़का- तो क्या हो जाएगा, आने जाने दो। हम लोग अपने में मस्त रहेंगे।
लड़की- बूद्धू हो, कुछ समझ में नहीं आता, और सटकर बैठो।
लड़का- ठीक है, सुनाओ, कान में ही कहोगी?
लड़की- कौन नई मूवी आई है।
लड़का- बधाई हो… ।
लड़की- टिकट बुक कराया?।
लड़का- बुधवार को देखेंगे… अभी मेरे पास समय नहीं है।
लड़की- तुम्हारे पास समय कब रहता है अभी समय है न।
लड़का- हाउसफुल जा रहा है.. ।
लड़की- खड़े होकर देख लेंगे।
लड़का- पांच मिनट खड़े होकर दिखाओ.. मैं अभी मूवी दिखाने को तैयार हूं ।
लड़की- शर्त लगी।
लड़का- बिल्कुल मान लो… ।
लड़की- पक्की।
लड़का- हां हां पक्की… ।
लड़की- नहीं तुम्हारा कोई भरोसा नहीं।
लड़का- अपने पर तो विश्वास करना सीखो… ।
लड़की रूठ जाती है और मुंह फेरकर दूसरी ओर बैठकर स्मार्ट मोबाइल में खोने का नाटक करने लगती है।
लड़का मनाने की कोशिश में चाट पकौड़े की चर्चा छेड़ता है और लड़की मानने लगती है।
लड़की- जाओ तुमसे नहीं बोलती।
लड़का- मत बोलो.. लेकिन पानी पूरी और चाट तो ले ही सकती हो ।
लड़की- हूं.. हं। मैं तो आज मूवी का मूड बनाकर आई थी तुमने मूड खराब कर दिया।
लड़का- पहले बता दी होती तो मैं ऑफिस में टिकट बुक करा लेता अब टिकट ही नहीं मिलेगा तो मूवी क्या देखोगी?
दोनों कुछ देर में चाट पकौड़े की दुकान का रूख कर लेते हैं।
दृश्य-3

डा. गुलाटी और उनकी मिसेज घर पहुंचते हैं। दरवाजा खुलते ही डा. गुलाटी पीठ में दर्द की बात कहते हुए सोफे पर लेट जाते हैं। उन्हें अभी चाय की ललक जगी हुई है। वह बार-बार किचन की ओर देखते हैं लेकिन अपनी पत्नी को कुछ कह नहीं पाते हैं। उन्हें एक तकरीब सूझती है। वह मिसेज गुलाटी के पाक कला की तारीफ करना शुरू करते हैं।
मि. गुलाटी- कल तुमने जो परांठा बनाया था बहुत ही लाजवाब था।
मिसेज गुलाटी- अच्छा, तुम्हें अच्छा लगा?
गुलाटी- क्यों, तुम्हें अच्छा नहीं लगा क्या?
मिसेज गुलाटी- उसमें तो नमक बहुत ही कम था। फिर भी तुम्हें अच्छा लगा?
गुलाटी- नमक से क्या फर्क पड़ता है, स्वाद तो उसके पकने में है।
मिसेज गुलाटी- बिना नमक के भी स्वाद आता है?
गुलाटी- हर आदमी का अंदाज अलग होता है। मेरी जान। चलो कोई बात नहीं। तुम्हें चाय पीनी है?
मिसेज गु. -नहीं, अभी नहीं।
गुलाटी- चलो मैं अपने लिए बना लेता हूं।
मिसेज गु.- अपने लिए बनाएंगे तो एक कप ज्यादा पानी नहीं डाल सकते।
गुलाटी- यही तो पूछ रहा था। दो कप ज्यादा बना लेते हैं अगली बार भी पी लूंगा।
मिसेज गु.- तो जल्दी कीजिए।
गुलाटी- जल्दी किस बात की। इन बातों में जो मजा है वह चाय में कहां?
मिसेज गु.- तो बातें ही पीकर तरोताजा हो जाइए।
गुलाटी- केवल इसी से काम नहीं चलता। कुछ तरलता भी जरूरी है।
मिसेज गु.- तरलता मतलब।
गुलाटी- तुम्हें तो केवल मतलब से ही मतलब है। दुनिया बहुत ही मतलबी है।
मिसेज गु.- दुनिया मतलबी है तो आप कौन त्यागी पुरूष हैं। बिना मतलब तो कोई किसी हंसी-मजाक भी नहीं करता।
गुलाटी- देखा स्त्री अधिकारों पर समाज में तहलका मचा हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने तुम्हें अधिकार दे दिया है कि अब अपनी मनमर्जी का संतुष्टि वाले पुरूष के साथ जी सकती हो।
मिसेज गुलाटी- क्या बक रहे हैं।
गुलाटी-सच बोल रहा हूं। टीवी में न्यूज चैनल भी देख लिया करो। या कभी कभार अखबार पढ़ लिया करो।
मैं नहीं पढ़ती अखबार।
गुलाटी-तब कैसे जानोगी अपने अधिकार। सुप्रीम कोर्ट ने धारा 497 खत्म कर दिया है। मतलब अब कोई भी अपनी संतुष्टि का रास्ता ढूंढ़ सकता है।
मिसेज गुलाटी-मर्द तो पहले भी ऐसा करते थे।
गुलाटी-हां, तो उन्हें जेल जाना पड़ता था। अब जेल नहीं रिहाई मिली है। तलाक ले लें।
गुलाटी- इससे पहले कि कोई दूसरा मी टू आए मैं इस दुनिया को छोड़ देना चाहता हूं।
मिसेज गुलाटी-इसका मतलब कि आपने चोरी की है।
गुलाटी-अब कुंवारे जीवन का भी हिसाब देना पड़ेगा?
मिसेज गुलाटी-लड़कियों की अग्निपरीक्षा तो लेते रहते हैं मर्द अपनी परीक्षा की बारी आई तो स्वर्ग का रास्ता दिखने लगा?
गुलाटी-वही तो अंतिम वास है जहां चिर-असीम शांति मिलती है।
मिसेज गुलाटी-शांति के लिए शांति करम भी होने चाहिए।
गुलाटी-करम ही तो सब करा रहा है। चाय बनाओ? आलू छीलो और कभी कभार…..
मिसेज गुलाटी-बड़े स्वार्थी हो। एक दो काम क्या कर दिया। पूरे घर को सिर पर उठा ले रहे हो।

दृश्य-4
(डा. गुलाटी चाय बनाने चले जाते हैं। उनकी पत्नी सोफे पर बैठी अपनी जवानी के दिनों को याद करते हुए उन रंगीन पलों को निहारते हुए युगों के सफर का विश्लेषण कर रही है। कितने अच्छे दिन थे वे भी काश! जवानी के दिनों की रंगत और इस बुढ़ापे की कसक में कितना जमीन आसमान का अंतर आ गया है। दिन बीते, महीने फिर साल और अब युग भी बीत गए। अपनी कहानी के किस्से यूं ही पड़े रहेंगे? क्या इस पर एक छोटी सी फिल्म नहीं बनाई जा सकती? जरूर बनाई जा सकती है। छोटी सही एक यादगार फिल्म तो बनाई ही जा सकती है। डा. गुलाटी से चर्चा करती हूं।)

तब तक चाय का दो प्याला लिए हुए डा. गुलाटी बैठका में पहुंचते हैं और श्रीमती को विचार मगर देख खुद ही उसकी भावनाओं को समझने का प्रयास करते हुए चाय पीना प्रारंभ करते हैं।
‘‘अजी सुनते हो।’’
‘‘ क्या?’’
‘‘ हमलोगों ने जिंदगी के 70 वसंत देख लिए हैं।’’
‘‘ मैंने तो 74 देख लिए हैं।’’
‘‘ कोई बात नहीं सत्तर ही मानकर चलते है।’’
‘‘ तो………?’’
‘‘ मेरे मन में एक विचार आया है कि क्यों न इन 70 पर तो नहीं लेकिन 45 साल के हमारी खुशहाल, रंगीनियों भरी जिंदगी पर कोई फिल्म नही बन सकती?’’
‘‘ क्यों नहीं बन सकती?’’
‘‘ तो किसी डायरेक्टर से बात करो न।’’
‘‘ ठीक कल बात करूंगा।’’
‘‘ कल नहीं आज ही।’’
‘‘ अरे भागवान, पहले तो उनके नंबर भी लाने पड़ेंगे।’’
‘‘ किससे लाने होंगे।’’
‘‘ सिन्हा जी के पास हो सकते हैं।’’
‘‘ अच्छा तो सिन्हा जी फिल्म लाइन से जुड़े हुए है।’’
‘‘ नहीं, पहले मंुबई गए थे लेकिन हीरो तो बन नहीं पाए लौट आए थे। फिर भी उनकी जान पहचान बॉलीवुड में है।’’
‘‘ इसके लिए मुंबई से आदमी बुलाने की क्या जरूरत है। दिल्ली में डायरेक्टर- एक्टर नहीं मिल जाएंगे।’’
‘‘ वो तो मिल जाएंगे लेकिन फिल्म कैसै लिखी जाए, बनाई जाए इसके लिए एक्सपर्ट की जरूरत होती है।’’
‘‘ तो क्यों नहीं अभी सिन्हा साहब से बात कर लें।’’
‘‘ अभी बेचारे कोई काम कर रहे होंगे।’’
‘‘ अजी कौन सा काम है उनको। हद से हद बच्चे खिला रहे होंगे।’’
वही भी तो एक काम है।’’
‘‘ ठीक ही कह रहे हैं आज हमारे बच्चे-बहू हमारे पास होते तो पोते-पोतियों को खिलाने का सौभाग्य हमें भी मिलता लेकिन छोड़ों क्या दुखड़ा कहा सुना जाय।’’
‘‘ नहीं तुम्हारी बात सही है कि अकेले में बुजुर्ग की रचनाशीलता का सम्मान होना चाहिए।’’  
डा. गुलाटी रचनाशील और हंसमुख इंसान हैं। उनकी पत्नी थोड़ी जलने भुनने वाली नारी है। लेकिन पत्नी के बातों को लेकर झगड़ा रगड़ा करने की जगह वह कडवी से कडवी बात को भी मजाक में उड़ाकर हंसी खुशी का माहौल बनाए हुए हैं। पत्नी की फिल्म बनाने की जिद के आगे वह बिछ जाते हैं। यह कहकर नहीं टालते कि छोड़ो यह सब बेकार की बातें है हमलोगों की जो भी जमा पूंजी है वह सब उसमें स्वाहा हो जाएगी। यह पति पत्नी के बीच सामजंस्य का ही नतीजा है कि पत्नी अगर कोई कहा नहीं करती है मानती है तो उससे झगड़ने रार ठानने से अच्छा है कि वह काम खुद कर लिया जाए। फिल्म बनेगी कैसे इसके बारे में नहीं फिल्म जरूर बने इसके बारे में सोचने का समय है डा. गुलाटी के लिए।
इस शॉट को तीन-चार शेडों में फिल्माया जा सकता है जहां एक बुजुर्ग दंपति की चाहत भी रचनाशीलता की ओर मुड़ती है। आगे चलकर बहुत सारी दुश्वारियां और ज्यादा धन खर्च होने की बात आने पर फिल्म बनाने का उत्साह ठंडा पड़ जाता है और मि. एंड मिसेज गुलाटी नेपथ्य में हीरो-हीरोइन के रूप में सजे धजे सपने में अपनी फिल्म के पूरे होने के बाद उसे अपने टीवी सेट पर रोमांटिक अंदाज में बैठकर देख रहे हैं।
शेड आउट और हंसते मुस्कुराते चेहरे के साथ दोनों एक बार फिर पार्क में टहल रहे हैं जहां सिन्हा, वर्मा और शर्मा जी उनकी यादगार फिल्म की चर्चा छेड़कर उन्हें गुदगुदाते हैं  और सभी ठहाका लगाकर बुजुर्ग होने का मतलब थकना नहीं बल्कि नई ंऊर्जा से भरने वाले जिंदगी का दूसरा नाम है।

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