जमींदार सूर्यभान,पक्की दालान के दूसरे माले की छत पर चहलकदमी कर रहे थे ।बाढ का पानी अटखेलियां कर रहा था।उधर मजदूर बस्ती मे ददू के बच्चे भूख से बिलबिला रहे थे।ददू की पत्नी करमी को कुछ सूझ नहीं रहा था।घर मे अनाज नहीं था। उसने हंसिया लिया और दो बीसा खेत मे लगा धान जो अधपका था। उसके सामने बस यही उपाय था कि कच्चा धान काट कर लाये,उबाले,चूल्हे मे  सूखाये,कूटे पीसे जिससे बच्चों के मुंह मे दो निवाले जा सके। करमी अपने खेत से अधपका बोझ भर धान काट कर आ रही थी।  चहलकदमी कर रहे जमींदार सूर्यभान की नजर करमी पर पड़ी,वह छत पर से अपने मवाली चचेरे भाई सविन्दर को आवाज दिये-देख सविन्दर चोरनी धान काट कर ले जा रही है।सविन्दर लाठी लेकर दौड़ लगा दिया।करमी को घेरकर बोला चोरनी चल भाई साहब बुला रहे हैं।
करमी हिम्मत कर बोली चोरनी है तुम्हारी माँ,चोर है तुम्हारा खानदान।
सविन्दर चल हवेली तब पता चलेगा कौन चोर हैं, वहीं नंगी हो जायेगी।हमारी मजूरन हमें चोर कह रही है।
सविन्दर की बदतमीजी से करमी की आंखों मे खून उतर आया ।वह हंसिया पर हाथ फेरते हुए बोली चल देखती हूँ किसकी माँ ने दूध पिलाया जो मुझे नंगा कर देगा।
इतने में सूर्यभान भी हाथ मे धोती का खूंट पकडे आ गए, आते ही बोले कच्चे धान की चोरी करने मे शरम नहीं आयी।
करमी हंसिया हवा मे लहराते हुए बोली हम मजूरों को शरम आती हैं,तभी छल,फरेब, चोरी नहीं करते, शरम तो जमींदार को नहीं आती जो चोरी, बेईमानी, मजूरी छिनना अपनी शान समझते हैं। अपने खेत से ला रही हूं मजूरन हूँ मेहनत, मजूरी और इज्ज़त की रोटी अपने बच्चों को देतीं  हूँ।
मजूरन करमी की शेरनी जैसी दहाड़ से हवेली की नीव जैसे हिल गई।वह दहाड़ती हुई अपने घर की ओर चल पड़ी।जमींदार सूर्यभान की आंखे फटी की फटी रह गई ।
डां नन्द लाल भारती

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