फरहात को सुन के

उमर का ऐसा है सफर शाम के बाद
छूट जाती है सबकी डगर शाम के बाद

हम इस कदर अपने घर रहे कि भूल गए
सबके घर हैं मिट्टी के घर शाम के बाद

दफ्तर में उनके नाम के आगे बड़े बड़े ओहदे थे
वो ही मिले संग टूटे हुए पर शाम के बाद

कई ऐसे हसीन जो चाँद को टक्कर देते थे
किसी ने उन्हें ना दी एक नज़र शाम के बाद

 

—विपुल त्रिपाठी

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