आमने – सामने

आमने – सामने

(काव्य-संग्रह)

 

 

 

 

 

 

 

 

सम्पादन व अनुवाद:

देवी नागरानी

                                                             

 

 

 

 

 

आमने–सामने

(हिन्दीसिन्धी कविताओं का अनुवाद)

 

ISBN : 978-81-7329-410-5

Copyright: Translator

First Edition: 2016

Copies: 500

Price: Rs.250

Publisher: Shilalekh, 4/32, सुभाष गली, विश्वास नगर, शाहदरा, दिल्ली-११००३२

email: shilalekhbooks@rediffmail.com.

Composing, printing by

Scan Computers: 3, Radheshyam Apt, Patia, Naroda Road, Ahmedabad-382340

Ph: 9327007002

PUBLISHED With THE FINANCIAL HELP of NCPSL

Aamne-Sanmne: Book of Poetry Compiled and Translated by Devi Nangrani

 

 

 

 

समर्पण

अपनी पहचान पाने की

बाहरी व भीतरी खलाओं में खोई मानवता…

अपनी ही क़ैद की छटपटाहट में

सवालों के समंदर में आज भी पूछ रही है….

 

मैं कौन हूँ?

जो मैं ‘मैं’ नहीं,

तो कौन हूँ मैं?

गर मैं ‘वो’ नहीं जो बात करता हूँ,

तो कौन हूँ मैं?

गर ये ‘मैं’ सिर्फ़ वस्त्र हूँ,

तो कौन है

जिसका मैं आवरण हूँ?

-रूमी

 

 

 

 

 

 

मेरी बात—                                     जो मैं सोचती हूँ और जो वह सोचता है, एक साथ, एक ही समय में अगर स्पंदन पैदा करे तो मार्गदर्शक का दर्शन हो जाता है….! उस दर्शनिकता के अनुसार यक़ीनन जब हम आँखें मूँदते हैं तो हम पूरे साठ सेकंड रोशनी से महरूम रहते हैं, यानि अंधेरा घेर लेता है। उजाले के बिना मुक्ति कहाँ? मुक्ति के लिए अपना स्वतः का काम करना है। जब दूसरे रुक जाएं तब हमें चलना है, जब दूसरे सो जाएं तब हमें जागना है। इस संग्रह में मैं अपनी ओर से और कुछ न कहकर गैबरियल गर्शिया मारकुएज़ का लिखा अलविदाई ख़त प्रस्तुत कर रही हूँ। यह उनका नहीं हर मानव मन की संवेदना का एक दस्तावेज़ है….!                                         और विशेष धन्यवाद वेद शास्त्र की पुरोधा डॉ. मृदुल कीर्ति जी का, जिनकी भावाभिव्यक्ति इस कृति के हर लेखक लेखिका को अपने ही चरित्र के आईने में आमने- सामने करने में सक्षम है। मैं तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ शिलालेख प्रकाशन की व् स्कैन कंप्यूटरस की जिनके प्रयासों के एवज़ यह संग्रह आपके हाथों में आ पाया है। लेखकों की अनुमति से इस संग्रह को अंजाम देने में कारगर हुई हूँ. शुभेच्छा के साथ:                  आपकी आपनी,                                                                 देवी नागरानी                                                           6 अगस्त, 2016

By: Gabriel Garcia Marquez

Write your hate on ice

If God, granted me a little bit more of life, I would use it to the best of my ability. I wouldn’t, possibly, say everything that is in my mind, but I would be more thoughtful of all I say. I would give merit to things not for what they are worth, but for what they mean to express.I would sleep little, I would dream more, because I know that for every minute that we close our eyes, we waste 60 seconds of light. I would walk while others stop; I would awake while others sleep. I would listen when others talk, and how I would enjoy a good chocolate ice cream!

If God would give me a little bit more of life, I would dress in a simple manner,  I would place myself in front of the sun, leaving not only my body, but my soul naked at its mercy.

My God, if I had a heart full of pain, I would write my hate on ice, and wait for the sun to show so my hated melts with the ice and flows with water. Over the stars I would paint with a Van Gogh dream a Benedetti poem, and a Serrate song would be the serenade I’d offer to the moon. With my tears I would water roses, to feel the pain of their thorns, and the red kiss of their petals.

My God, if I had a piece of life…I wouldn’t let a single day pass without telling the people that I love them. I would convince each woman and each man that they are my favorites, and I would live in love with love. I would show men how very wrong they are to think that they cease to be in love when they grow old, not knowing that they grow old when they cease to love!

To a child I shall give wings, but I shall let him learn to fly on this own. I would teach the old that death does not come with old age, but with forgetting. So much have I learned from you, oh men…!

I have learned that everyone wants to live on the peak of the mountain, without knowing that real happiness, and how it is scaled. I have learned that when a new born child squeezes for the first time with his tiny fist of his father’s finger, he has him trapped forever.

I have learned that a man has the right to look down on another only when he has to help the other get to his feet. From you I have learned so many things, but in truth they won’t be of much use, for when I keep them within this suitcase, unhappily I shall be dying.

Farewell Letter by Gabriel Garcia Marquez-(March 6, 1927-April 17, 2014)

 

 

हिन्दी अनुवाद: देवी नागरानी

अपनी नफ़रत को बर्फ़ पर लिखो

अगर ख़ुदा ने मुझे थोड़ी सी ज़िंदगी और बख़्शी तो मैं वह अपनी यथासाध्य योग्यता के अनुसार उपयोग करूंगा। मैं कोशिश करके जो सोचता हूँ सब कुछ नहीं कहूँगा, वह सोचने की बजाय जो मैं कहता हूँ, उस बारे में सोचूंगा। मैं किसी भी चीज़ की क़द्र उसकी क़ीमत सबब नहीं, पर उसकी अभिव्यक्ति के भाव से लगाऊँगा। मैं कम सोऊंगा और जागरण में सपने देखूंगा क्योंकि मैं जान गया हूँ कि हर उस मिनट में जब हम आँखें मूँदते हैं तो हम पूरे साठ सेकंड रोशनी से महरूम रहते हैं। जब दूसरे रुक जाएंगे तब मैं चलता रहूँगा। जब दूसरे सो जाएंगे, मैं जागता रहूँगा। जब दूसरे बात करेंगे मैं सुनूंगा और अच्छे अच्छे चॉक्लेट खाऊँगा। अगर ख़ुदा मुझे थोड़ी ज़िंदगी और दे, तो मैं अच्छे अच्छे कपड़े पहनूंगा। धूप की उष्मा सिर्फ़ अपने जिस्म तक ही नहीं, अपनी रूह तक भी पहुंचाऊंगा.

ऐ ख़ुदा! जब मैं ग़मगीन हो जाऊंगा तो अपनी नफ़रत को बर्फ़ पे लिखूंगा और सूर्योदय का इंतज़ार करूंगा, ताकि बर्फ़ के साथ मेरी नफ़रत भी पिघल कर पानी के साथ बह जाये। मैं वैन गौ (van Gogh) की तरह तारों पर नज़्म लिखूंगा और चाँद के लिए प्यार के गीत गाऊँगा। मैं अपने आंसुओं से गुलाबों को सीचूंगा और काँटों के दर्द व गुलाबी पंखुड़ियों का स्पर्श महसूस करूंगा।
ऐ मेरे ख़ुदा! मुझे दुबारा ज़िंदगी मिले तो मैं कोई दिन ऐसा नहीं गुज़ारूंगा कि मैं लोगों को यह संदेश न दूँ कि मुझे उनसे प्यार है। मैं हर औरत और हर मर्द को यह विश्वास दिलाऊंगा कि वे मेरे प्रिय हैं, और मैं प्यार से प्यार करने के लिए जिऊँगा। मैं लोगों को बताऊंगा कि वे ग़लत है जब वे सोचते हैं कि जब वे वृद्ध हो जाते हैं तो प्यार नहीं कर सकते। वे नहीं जानते कि जब वे मुहब्बत करना छोड़ देते हैं तब बूढ़े हो जाते हैं। बच्चों को मैं उड़ने के लिए पंख दूँगा ताकि वे खुद उड़ान भरने की कोशिश करें। मैं बुज़ुर्गों को बताऊंगा कि मौत बुढ़ापे से नहीं आती पर सब कुछ भुलाने से आती है।                                                    ऐ इन्सान मैंने तुमसे बहुत कुछ सीखा है। मैंने सीखा है कि हर कोई पहाड़ की चोटी पर रहना चाहता है, यह न जानते हुए कि असल खुशी इस बात में है कि चोटी पर कोई पहुंचा कैसे! मैंने यह भी जान लिया है जब कोई नवजात शिशु अपने पिता की उंगली पकड़ता है तो वह अपने पिता को अपनी मुहब्बत में हमेशा के लिए क़ैद कर लेता है। मैंने सीख लिया है कि इन्सान को नीचे सिर्फ उस वक़्त देखना चाहिए जब उसे किसी दूसरे इन्सान को ऊपर उठाना हो। ऐ आदम! मैंने तुमसे बहुत कुछ सीखा है पर सच यह है कि अगर मैं यह सब कुछ अपने सीने में दबाकर मर जाऊंगा तो वह दुर्भाग्यशाली मौत होगी!

गैबरियल गर्शिया मारकुएज़ का लिखा अलविदाई ख़त-     देवी नागरानी,  6 अगस्त, २०१६

0

पुरोवाक

मैं -मेरा-ममकार –से परे।

मैं, मेरा, ममकार ही केंद्र बिंदु है।

अहम का अगाध सिंधु है।

मेरे अहम-अहंकार की परिधि में कोई समाता ही नहीं।

मेरा भोग, मेरी भूख, मेरा भोजन, मेरा भजन, मेरा वसन,

मेरा जन्म, मेरा दर्द, मेरा कर्म, मेरा मर्म,

मेरा  कथना,  मेरा वचना, मेरी रचना ही सर्वांश है।

शेष जगत बहुत बाद की चीज़ और एकांश है।

इन सत्यों को उलाँघ  कर, आत्मीयता की देहरी पर
स्नेहिल आवाहन का दिया जलाया।

सभी को मनुहार कर बुलाया।

सभी के भाव पुष्पों से, एक गुलदस्ता बना कर

सिंधी भाषा में अनुवादित कर आमने-सामने रख दिया।

है किसी में यह उदार उन्माद ?

है किसी के पास इतनी आत्मीयता का प्रसाद।

किसी अन्य का सत्व, अस्तित्व और महत्त्व

स्वीकार कर पाने को बहुत-बहुत ऊँची मानसिकता

उदात्त, स्नेह आविल हिया और आत्मीयता चाहिए

क्योंकि, स्वयं को संचित किये बिना, और

अन्य को वंचित किये बिना जीना नहीं है हमारी आदत

उस आदत से परे प्रेम को इबादत

अन्यों के भाव सुमन में मान्यता की सुगंध देने की बिसात

देवी जी के उदार,  उत्कर्ष,  स्नेहिल,  उद्दात,

ममत्व, अपनत्व और समत्व आविल

उदगार , सबको स्वयं  में समेट लेने की

आतुरता, देवी को अन्यों से इतर करती है।

एक मर्म की बात

देवी जी को जीवन के सूत्र मिल गए हैं.

कि प्राणों का मूल्य प्रेम से ही बढ़ता है।

विस्तृत प्रेम अहम को तोड़ता है

विस्तृत प्रेम विराट से जोड़ता है.

मैं मिटा मेरा मिटा, अब तो तू ही तोय।

प्रेम जब अपने तक सीमित हो तो राग,

निःस्वार्थ विकसित हो तो अनुराग,

निःस्पृह अनुराग ही विराग है.

बस यहीं जीवन के सूत्र हाथ लग गए, और

आमने-सामने आ गए।
आंतरिक प्रेमपगी सौंदर्य मयी देवी जी को नमन,

वंदन, अभिनन्दन।

अभी देवी जी से आमना-सामना नहीं हुआ

किन्तु कदाचित मेरा ही आमना-सामना हुआ है!

डॉ मृदुल कीर्ति , अमेरिका

 

 

अनुक्रम:

एक औरत

अभिमन्यु अनत

अमृता प्रीतम

अनीता ठक्कर

अनीता कपूर

अनूप भार्गव

अतिया दाऊद

बी. एल. गौड़

भरत तिवारी

ध्रुव तनवाणी

गीता राज

गोवेर्धन यादव

हरकीरत हीर

हर्षवर्धन आर्य

हेमंत उपाध्याय

जया जादवानी

के. टी. दादलानी

लावण्या शाह

लक्ष्मीशंकर बाजपई

मंजु मिश्रा

माया मृग

मृदुल कीर्ति

नईमा इम्तियाज़ ‘शम्मा’

नरेंद्र मोदी

नरेंद्र मोहन

पद्मजा शर्मा

पदमेश गुप्त

पारु चावला

पूर्णिमा वर्मन

पुष्पा वल्लभ

राजम नटराजन पिल्लै

राजी सेठ

रश्मी रामानी

रेखा मैत्र

संजीव वर्मा ‘सलिल’

संतोष श्रीवास्तव

सरिता मेहता

शशि पाधा

शालिनी सागर

शील निगम

सुधा ओम ढींगरा

सुमीता केशवा

सुनीता लुला

सुषम बेदी

तारा सिंह

तरसेम गुजराल

उषा राजे सक्सेना

वंदना गुप्ता

वेद प्रकाश वटुक

विम्मी सदारंगानी

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी-

सतार पीरज़ादो

दीपक लालवानी

अनुवादिका का परिचय-

  बेनाम

एक औरत की पाती पति के नाम:

देह मेरी, हल्दी तुम्हारे नाम की

हथेली मेरी, मेहंदी तुम्हारे नाम की

सिर मेरा, चुनरी तुम्हारे नाम की

मांग मेरी, सिन्दूर तुम्हारे नाम का

माथा मेरा, बिंदिया तुम्हारे नाम की

नाक मेरी, नथनी तुम्हारे नाम की

गला मेरा, मंगलसूत्र तुम्हारे नाम का

कलाई मेरी, चूड़ियाँ तुम्हारे नाम की

पाँव मेरे , महावर तुम्हारे नाम की

उंगलियाँ मेरी, बिछुए तुम्हारे नाम के

बड़ों की चरण-वंदना मै करूँ,
और ‘सदा-सुहागन’ का आशीष तुम्हारे नाम का

और तो और-करवाचौथ/ बड़मावस के व्रत भी
तुम्हारे नाम के
यहाँ तक कि
कोख मेरी/ खून मेरा/ दूध मेरा,
और बच्चा ? बच्चा तुम्हारे नाम का

घर के दरवाज़े पर लगी
‘नेम-प्लेट’ तुम्हारे नाम की

और तो और –
मेरे अपने नाम के सम्मुख
लिखा गोत्र भी मेरा नहीं, तुम्हारे नाम का

सब कुछ तो
तुम्हारे नाम का… नम्रता से पूछती हूँ :
आखिर तुम्हारे पास क्या है—मेरे नाम का…?

0

 

 

सिन्धी अनुवाद:

हिक ज़ाल जो घोट जे नाले लिख्यल खतु !

 

देहि मुहिंजी, हैड तुहिंजे नाले जी

 

तिरी मुहिंजी, मेहिंदी तुहिंजे नाले जी

 

मथो मुहिंजो, पोती तुहिंजे नाले जी

 

सींध मुहिंजी, सिंदूर तुहिंजे नाले जो

 

नकु मुहिंजो, नथ तुहिंजे नाले जी

 

गिच्ची मुहिंजी, मंगलसूत्र तुहिंजे नाले जो

 

काराई मुहिंजी, कंगंणु तुहिंजे नाले जो

 

पेरु मुहिंजो, विछूँअड़ो तुहिंजे नाले जो

 

आंगुर मुहिंजी, मुंढी तुहिंजे नाले जी

 

न खे पेरे माँ पवां,

‘सदा सुहागिण रहु’ जी आशीष तुहिंजे नाले जी

बियो त बियो

करवा चौथ /वडी उमास जो विर्तु बि
तुहिंजे नाले जो

एतरो जो….

कोख मुहिंजी / खून मुहिंजो / खीरु मुहिंजो
ऐं बारु ? बारु तुहिंजे नाले जो ।

घर जे दरवाज़े ते ल
‘नेम-प्लेट’ तुहिंजे नाले जी

बियो त बियो –
मुहिंजे पहिंजे नाले जे अगियां
लिख्यल गोत्र भी मुहिंजो नाहे, तुहिंजे नाले जो

 

सब कुछ त
तुहिंजे नाले जो… निमांणाईअ सां थी पुछाँ:
आखिर तव्हाँ वटि छा आहे– मुहिंजे नाले जो…. ?

0

मूल: अभिमन्यु अनत

खाली पेट

तुमने इन्सानों को खाली पेट दिया

अच्छा किया !

पर एक सवाल है ऐ क़िस्मत!

खाली पेट वालों को

तूने आँसू क्यों दिये?

उन तक पहुँचने वाले हाथ क्यों दिये?

पता: ‘समाधान’ संवादिता, त्रियोले, रोयल रोड, मरीशस

 

 

 

 

 

 

सिन्धी अनुवाद:

खाली पेटु

तो मांणहुन खे खाली पेटु डिनो

सुठो कयुइ !

पर, ऐ क़िस्मत हिकु सवालु आहे!

खाली पेट वारन खे

तो गोहा छो डिना ?

उन्हन ताईं डिघेरण वारा हथ छो डिना?

0

 

 

 

 

 

 

 

मूल:अमृता प्रीतम

मेरा पता

आज मैंने

अपने घर का नंबर मिटाया

और गली के माथे पर लगा

गली का नाम हटाया है

और हर सड़क की

दिशा का नाम पोंछ दिया है

पर अगर आपको मुझे ज़रूर पाना है

तो हर देश के, हर शहर की

हर गली का द्वार खटखटाओ

यह एक श्राप है, एक वर है

और जहां भी

आज़ाद रूह की झलक पड़े

–समझना वह मेरा घर है!

सिन्धी अनुवाद:

मुहिंजों पतो

जु मूँ

पहिंजे घर जो नम्बर मिटाए छडियो

ऐं घिटीअ जे मथे ते ललु

घिटीअ जो नालो हटायो आहे

ऐं हर हिक रस्ते जी

दिशा जो नालो उघी छडियो आहे

पर,

तव्हांखे जे मुखे हरू-भरू पाइणो आहे

त हर देश जे, हर शहर जे

हर घिटीअ जो दरु खड़खड़ायो,

हीऊ हिकु परातो आहे, ऐं वरदान आहे

ऐं जिते बि

आज़ाद रूह सां मुहाखड़ो थिये

समिझिजो उहो मुहिंजों घरु आहे !

0

 

 

 

मूल: डॉ. अनीता ठक्कर

कश्मीरी औरत

कश्मीरी औरत माँ बनने से घबराती है

गर बेटा पैदा हुआ, तो

आतंकवाद का शिकार होगा

गर बेटी हुई, तो

बलात्कार की शिकार होगी

कश्मीरी औरत माँ बनने से घबराती है !

बजट

माँ जब तुम खुद भूखी रहकर

अपने हिस्से के खाने के पैसे बचाकर

मेरी स्कूल की फीस भरती थी

तब मैंने जाना घर का बजट क्या होता है ?

पता: फ्लैट नं-904, बिल्डिंग नं-349, सैक्टर 03, मीरा रोड, ठाणे-401107

 

सिन्धी अनुवाद:

कश्मीरी औरत

कश्मीरी औरत माउ बणजण खाँ घबराईन्दी आहे

जे पुट जाओ, त

आतंकवाद जो शिकारु थींदो

जे धीअ जाई, त

बलात्कार जो शिकारु थींदी

कश्मीरी औरत माउ बणजण खाँ घबराईन्दी आहे!

बजट

अम्माँ जहिं तूँ पाण बुखी रही करे

पाहिंजे हिस्से जे खाधे जा पैसा बचाए

मुहिंजे स्कूल जी फीस भरींदी हुईंअ

हिं मूँ जातो घर जो बजट छा थींदो आहे ?

0

मूल: अनीता कपूर

आँखों की सड़क

मेरी आँखों की सड़क पर

जब तुम चलकर आते थे

कोलतार मखमली गलीचा बन जाता था

मेरी आँखों की सड़क से जब

तुम्हें वापस जाते देखती थी

वही सड़क रेगिस्तान बन जाती थी

तुम फिर जब-जब वापस नहीं आते थे

रगिस्तान की रेत

आँख की किरकिरी बन जाती थी

आँखों ने सपनों से रिश्ता तोड़ लिया था

फिर मुझे नींद नहीं आती थी

संपर्क: 4356 क्वीन एने ड्राइव , यूनियन सिटि, कैलिफोर्निया-94587

 

 

 

 

सिन्धी अनुवाद:

अखियुन जी वाट  

मुहिंजी अखियुन जी वाट ते

हिं तूँ हल्यो ईन्दो हुयें

डामर मखमली गालीचो थी पवंदों हुयो

मुहिंजी अखियुन जी वाट ते

हिं तोखे वापस वेंदो डिसंदी हुयस

उहाई वाट रेगिस्तान बणजी पवंदी हुई

तूँ वरी जहिं-जहिं वापस न मोटन्दो हुयें

रेगिस्तान जी वारी

अखयुन में किरकिरी थी पवंदी हुई

अखियुन सपनन सां नातो टोड़े छडियो हो

पोइ मुखे निंड न ईन्दी हुई।

0

 

 

 

 

 

मूल: अनूप भार्गव

क्या तुम ?

मैं और तुम, व्रत्त की परिधि के

अलग अलग कोनों में

बैठे दो बिन्दु हैं,

मैनें तो, अपनें हिस्से का अर्धव्यास पूरा कर लिया,

क्या तुम, मुझसे मिलने के लिये

केन्द्र पर आओगी ?

समाधान

अंको के गणित और तर्क की

ज्यामिति के दायरे में कैद ज़िन्दगी

एक कठिन समीकरण बन गई थी ।

तुम चुपके से आईं

और मेरे कान में प्यार से बस इतना ही कहा

‘सुनो’ ….मैं मुस्कुरा दिया, और अचानक,

ज़िन्दगी के सभी कठिन प्रश्न

बड़े आसान से लगने लगे ।

पता: 16 Dickinson Court, Plainsboro, NJ 08536

सिन्धी अनुवाद:

छा तूँ ?

माँ ऐं तूँ चकर जे संधे जे

धार-धार कुंडुनु में

वेठल बिन्दु आहियूँ,

मूँ त, पहिंजे हिस्से जो अधु कतरु पूरो करे छडियो,

छा तूँ मूँ साणु मिलण जे लाइ

मरकज़ ते ईंदीअं?

समाधानु

अदद जे गणित ऐं तर्क जी

जामेटरीअ जे दायरे में कैद ज़िन्दगी

हिक डुखी हिक जहिड़ाई बणजी पई हुई।

तूँ माठि में आईंअ

ऐं मुहिंजे कन में प्यार सां बस एतरोई चयुइ

‘बुधो’ ….मूँ मुरकी डिनो, ऐं ओचतो,

ज़िन्दगीअ जा सभ डुख्या सवाल

तमाम सवला लण लगा !                                                     0

 

 मूल: अतिया दाऊद

पहिंजी धीऊ जे नाले 

जे तोखे ‘कारी’ करे मारीन

मरी वञजांइ, ज़रूर नेंहु लाइजाँ

शराफ़त जे शोकेस में

नक़ाब कढी न वेहिजाँ ,

ज़रूर नेंहु लाइजाँ

उञायल ख्वाहिशुन जे रण पट में

थूहर जियाँ न रहिजां

ज़रूर नेंहु लाइजाँ

जे कहिंजी याद होरियां होरियां

मन में तुहिंजे हरी पए

मुरकी पइजां

ज़रूर नेंहु लाइजाँ

हू छा कंदा?

तोखे रुगो संगसार कंदा

जीवन पल तूँ माणिजां

ज़रूर नेंहु लाइजाँ !

नेंह तुहिंजे खे गुनाहु बि चयो वेंदो

पोइ छा? …सही वञजां

ज़रूर नेंहु लाइजाँ!

—‘कारी’ (कलंक)

हिन्दी अनुवाद:

अपनी बेटी के नाम

अगर तुम्हें ‘कारी’ कहकर मार दें

मर जाना, प्यार ज़रूर करना

शराफ़त के शोकेस में

नक़ाब ओढ़कर मत बैठना,

प्यार ज़रूर करना

प्यासी ख्वाहिशों के रेगिस्तान में

बबूल बनकर मत रहना

प्यार ज़रूर करना

अगर किसी की याद हौले-हौले

मन में तुम्हारे आ जाय

मुस्करा देना

प्यार ज़रूर करना

वे क्या करेंगे?

तुम्हें फक़त संगसार करेंगे

जीवन के पलों का लुत्फ़ लेना

प्यार ज़रूर करना!

तुम्हारे प्यार को गुनाह भी कहा जायेगा

तो क्या हुआ? …सह लेना।

प्यार ज़रूर करना!

0

मूल: बी. एल. गौड

पारे जैसा मन

किसी फूल पर ओस कणों सा है अपना जीवन

ना जाने कब आकर छूले कोई सूर्य किरण।

रहे भागते जीवन भर हम कस्तूरी मृग से

सपना एक सत्य हो जाये जीवन भर तरसे

सागर बीच किसी टापू पर अपना एक मकान

चारों ओर लहर है जल की फिर भी प्यास गहन।

मरूथल में अक्सर होता है जल होने का भ्रम

ज्ञान डोर से कब बँध पाया पारे जैसा मन।

सोचा हम भी कबिरा जैसी रखें चदरिया साफ़

पर हम ठहरे आम आदमी कबिरा थे खुद आप

कहते दुर्बल को न सताना इससे बड़ा न पाप

पर दुर्बल से छीन-छीनकर करते हम अर्जन !

पता: बी-159, योजना विहार, दिल्ली-110092

सिन्धी अनुवाद

 पारे जहिडो मनु

कहिं गुल ते शबनम जे कणन ज्यां आहे पहिंजो जीवन

न जाणु कहिं अची स्पर्श करे का सूर्य किरण।

रहियासीं डुकन्दा ता-उम्र असीं कस्तूरी मृग समान

सपनो हिकु सचु थी वञे जीवन भर सिकंदा रहियासीं

समुंढ सीर में कहिं जंजीरे ते पाहिंजों हिकु मकानु

चइनी पासे लहर आ जल जी पोइ बि अण उझामंदड़ प्यास ।

रेगिस्तान में घणों करे थींदों आ जल हुअण जो भ्रम

ज्ञान जी तंदु सां कहिं बधिजी सघियो पारे जहिडो मनु।

सोच्यो असां बि कबीर जहिड़ी चादर साफ़ रखूँ

पर असीं रहयासीं आम माणहू कबीर त हुयो खुद पाण

चवन था निबल खे न सताइ, उनखां वडो न पापु

पर ज़ईफ खां खसे-खसे करयूं असीं गुज़रान !

 

 

मूल: भरत तिवारी

आठवाँ परिंदाi

परिंदा बन रहा हूँ
परों पर कोपलें
उग रही हैं
सुना है
तुमने
सात आकाश बनाये हैं
मुझे आठवां देखना है

और

तुम जिस आकाश से देखते हो
मैं, उसमें तुम्हे देख लेता हूँ
खिड़की का पर्दा हटा कर…!

संपर्क: बी-67 SFS फ्लैट्स, शेख सराइ-1, मालवीय नगर, न्यू दिल्ली -17 , फोन: 91-98-11-66-4796

 

 

 

 

सिन्धी अनुवाद:

अठों पखीअड़ो

पखीअड़ो बणिजी रह्यो आहियाँ

परन ते बूर मुखिरी रही आहे

बुधो आ, तो

सत आकाश ठाहिया आहिन

मुखे अठों डिसणों आहे

ऐं

तूँ जहिं आकाश ताँ डिसंदो आहीं

माँ, उनमें तोखे डिसी वठंदो आहियां

दरीअ जो पर्दो हटाए…!

0

 

 

 

 

मूल : ध्रुव तनवानी

सिन्धी बोली

बुधो हो द्वापर में,
कंस ऐं अश्वत्थामा हूंदा हुया
जेके पंहिंजन ई बारन जा दुश्मन थी,  उन्हन खे मारींदा हुआ
पर उहे त राकस ऐं मिरूं हुया
इन्सानी रूप में
छा सिन्धियुन मथां इहो इल्ज़ामु न लगंदो?
त मातृभाषा हूंदे
उनखे मारे जीअंदा हुया?

पता: डा ध्रुव तनवानी, 2/75,मोराबदी रांची 834008

 

 

 

 

 

हिन्दी अनुवाद                                       सिन्धी भाषा    

सुना था द्वापुर में,
कंस और अश्वत्थामा हुआ करते थे
जो अपने ही बच्चों के दुश्मन बनकर

उन्हें मार देते थे
पर वे तो इन्सान के रूप में

राक्षस और हिंसक थे

क्या सिंधियों पर यही इल्ज़ाम नहीं लगेगा?
कि मातृभाषा होते हुए
उसे मारकर जीते थे ?

0

 

 

मूल: गीता राज

करमु

तो चयो हो, तो प्यारु कयो हो-

भीख न घुरी हुई

शम्अ जो कमु आहे रणु ऐं परवाने खे जलाइण

परवाने जी कुर्बानी कींअ थी?

तो चयो हो-

मुहिंजे मुँह में चांडाणि जो चिमको आहे, comma

लफ़्ज़न में माखीअ जो मेठाजु

इहा कुदुरत जी देन आहे

तो चयो हो-

इक़रार टुटण लाइ थींदा आहिन

जफ़ा, वफ़ा जो अलो कदमु आहे

तो साथु न निभायो

हू तुहिंजों करमु, ही मुहिंजों करमु

तूँ बि खुश, माँ बि खुश !

पता:33 cheyne walk, London nw4 3Qh।, U.K

 

 

 

हिन्दी अनुवाद:

कर्म-        

तुमने कहा था-तुमने प्यार किया था

भिक्षा नहीं मांगी थी

शम्अ का काम है जलकर परवाने को जलाना, यह

परवाने की कुर्बानी कैसे हुई?

तुमने कहा था-

मेरे चेहरे पर चाँदनी की चमक है

लफ़्ज़ों में शहद की मिठास,

यह क़ुदरत की देन है।

तुमने कहा था-

इक़रार टूटने के लिए होता है

जफ़ा, वफ़ा का अगला क़दम है

तुमने साथ नहीं निभाया

मैंने निभाया तो क्या हुआ?

वह तुम्हारा कर्म, यह मेरा कर्म

तुम भी ख़ुश, मैं भी ख़ुश!

0

 

 

मूल: गोवर्धन यादव

नदी                                                              

नदी क्या सूखी, सूख गए झरने
सूखने लगे झाड़-झंखाड़
उजाड़ हो गए पहाड़
बेमौत मरने लगे जलचर
पंछियों ने छॊड़ दिए बसेरे
क्या कोई इस तरह
अपनों को छॊड़ जाता है?

नदी-                                                                                                                     

उस दिन

और उदास हो गई थी

जिस दिन एक स्त्री

अपने बच्चों सहित

कूद पड़ी थी उसमें

और चाहकर भी वह उसे

बचा नहीं पायी थी.

पता: 103, कावेरी नगर, छिन्दवाडा (म.प्र.)

(अध्यक्ष, म.प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति)

 

 

सिन्धी अनुवाद

नदी
नदी छा सुकी, सुकी व्या झरना

सुकण लगा झंग-ढंगर
उजड़ी व्या पहाड़
बेमौत मरण लगा जलचर
पखियुन छडे डिना आशियाना
छा को हिन तरह
पंहिंजन खे छडे वेंदो आहे?.

नदी-         

उन डींहु वधीक उदास थी वई

जहिं  डींहु हिक नारी

पहिंजे बारन साणु

टिपु डिनो हो उनमें

ऐं चाहींदे बि हूअ उनखे

बचाए न सघी हुई!

0

 

 

मूल:हरकीत हीर

घरौंदे  ….                                                   

उसने कहा –

तुम तो शाख़ से गिरा हुआ

वह तिनका हो

जिसे बहाकर कोई भी ले जाये

मैंने कहा –

शाख़ से गिरे हुए तिनके भी तो

घरौंदे बन जाते हैं किसी परिंदे के….

2
दर्द हैरान था

ये किसने आह भरी है

जो मेरी क़ब्र पर से आज

फिर रेत उड़ी है….

3

ख़्यालों में

टूटा है कोई धागा

कि आज मेरे पैर फिर

दरगाह की ओर बढ़े हैं….

पता: १८ ईस्ट लेन, सुंदरपुर, हॉउस न-५, गुवाहाटी- ७८१००५ (असम)

सिन्धी अनुवाद:

आखेरो….

हुन चयो  –

तूँ त शाख़ तां किरियलु

उहो कखु आहीं

जहिंखे कोई बि वहाए खणी वञें

मूँ चयो –

शाख़ तां किरियलु कखु बि त

आखेरो ठाहे वेंदा आहिन

कंहिं परिंदे जो   …

2
दर्द हैरान हो

ही कंहि आह भरी आ

जो मुहिंजी क़ब्र ताँ अजु

वरी वारी उडामी आहे….

3

ख़्यालन में

टुटी आहे का तंदु

जो अजु मुहिंजा पेर वरी

दरगाह डांहु वधी रहिया आहिन….

0

मूल: हर्षवर्धन आर्य

एक मुट्ठी नमक

एक मुट्ठी नमक

नहीं,

वह एक शस्त्र था

जिसने गला दी

जड़ें

दो सौ वर्ष पुराने

‘ओक‘ वृक्ष की ।

जब गिरा भारी-भरकम बूढ़ा ‘ओक ‘

दे गया

गहरा घाव

और,

दर्दीली दरार धरती को !

पता: 2597/191, ओंकार नगर, त्रिनगर, जैन स्थानक रोड, दिल्ली-110035,

 

सिन्धी अनुवाद

हिक मुट्ठ लूंण 

हिक मुट्ठ लूंणु

नाहे ,

सा हिकु शस्त्र आहे

जंहि गारे छडियूं

पाड़ूँ

सौ साल पुराणे

‘ओक‘ वण जूं।

हिं भारी-भरकम बुढो ‘ओक ‘ किरयो

ई वयो

गहरो ज़ख्म

ऐं,

दर्द भरियल डार धरतीअ खे !

0         

 

 

 

मूल: हेमंत उपाध्याय

प्रेम

मैं

नवजात चिड़िया

सात कदम कर न सकूँ पार

तुम राजहंस

पार कर चुके सात समंदर ,

कई बार

फिर भी—

मेरे सहचर हो तुम

यही प्रेम का विस्तार है !

संपर्क: हेमंत उपाध्याय, साहित्य कुटीर, पं.राम नारायन जी (उपाध्याय ), वार्ड क़्र 43, खंडवा (मप्र) 450001.

 

 

सिंधी अनुवाद:

प्रेम

माँ

नओं जावल परिंदो

न करे सघाँ पार सत क़दम

तूँ राजहंस

पार करे चुकें सत समुंढ

केतराई भेरा

पोइ बि-

मुहिंजो साथी आहीं

इहोई प्रेम जो विस्तार आहे!

0

 

 

 

 

मूल: जया जादवानी

स्त्री

‘तहखानों में तहखाने

सुरंगों में सुरंगें

ये देह भी अजब ताबूत है

ढूंढ लेती हूँ जब ऊपर आने के रास्ते

ये फिर वापस खींच लेती है.’

देह स्वप्न

‘ले गया कपड़े सब मेरे

दूर…..बहुत दूर

काल बहती नदी में

मैं निर्वसना

तट पर

स्वप्न देखती देह का’

पता  :बी-136, वी.आई.पी. एस्टेट, विधान सभा मार्ग, रायपुर (छत्तीसगढ़)

 

 

 

सिंधी अनुवाद:

स्त्री

‘तहखानन में तहखाना

सुरंगुन में सुरंगूँ

हीअ देह बि अजब ताबूत आहे

गोल्हे वठाँ थी जहिं मथे अचण जा रस्ता

हीअ वरी वापस छिके थी वठे.’

देह स्वप्न

‘खणी वयो सब कपड़ा मुहिंजा

परे ….घणों परे

कालु वहंदड़ नदीअ में

माँ निर्वस्त्र

किनारे ते

सपुनो डिसां देह जो’

0

 

 

 

 

मूल: के.टी. दादलानी

विश्वशान्ति

इन्सान खे

फ़िक्र आहे

विश्वशान्तीअ जी

जहिंजो सबूत आहे

न्यूटेरोन बम-

सच पचु हिक डींहु

कंहिं मथे घुम्यल इन्सान जे

दिमाग़ जो फ़ितूर

विश्व खे शांत करे छडींदों !

पता-70, कम्फर्ट ग्रीन्स, न्यू सेंट्रल जेल, करोंद बाइ पास रोड, भोपाल, 462038

 

 

हिन्दी अनुवाद:

विश्वशान्ति

इन्सान को फ़िक्र है

विश्वशान्ती की

जिसका सबूत है

न्यूटेरोन बम-

सच में एक दिन

किसी सरफिरे इन्सान के

दिमाग़ का फ़ितूर

विश्व को शांत कर देगा !

0

 

 

 

 

 

मूल: लावण्या शाह

इन्सान  

तपती हुई धरती से
ठहरे हुए सहरा से
मुश्किल हर लम्हे से
इन्सां ही निकालता है
हर राह नई नई
जिन पर चलकर

आई हैँ, पीढ़ियाँ
इतिहास नया रचने
सेतु समय पर बांधने इस २१ वीँ सदी मेँ !

पता : ७०६२, मिडलटन वे, मेसन, ओहायो ४५०४०,  यु. एस. ए.

 

 

 

 

 

 

सिन्धी अनुवाद:

इन्सानु                                          

ततल धरतीअ मां
माठि जी सहरा मां
मुश्किल हर लम्हे मां
इन्सान ई कढंदो आहे

नित नईं-नईं वाट
जंहि ते हली करे
आयूं आहिन, पीढ़ियूं
नओं इतिहास रचण लाइ
पुल वक़्त ते धण लाइ हिन 21ईंअ सदीअ मेँ!

0

 

 

 

 

 

 

मूल: लक्ष्मीशंकर बाजपई

तुम्हारी तस्वीर

कमरे में टंगी

तुम्हारी बड़ी सी तस्वीर से

कहीं ज़्यादा परेशान करती हैं

बाथरूम में चिपकी

तुम्हारी छोटी-छोटी बिंदियाँ !

पता: 304, Laxmibai Nagar, New Delhi 110023 

 

 

 

 

 

 

 

सिन्धी अनुवाद:

तुहिंजी तस्वीर

कमरे में टंगियल

तुहिंजी वडी तस्वीर खां

घणों वधीक परेशान कंदियूं आहिन

बाथरूम में चुंबिड़ियल

तुहिंजूं नंढियूं-नंढियूं बिंदियूँ!

0

 

 

 

 

 

 

 

 

मूल: मंजु मिश्रा

उछाल दो

मुहब्बत के दो चार लफ़्ज़

ज़िंदगी के दरिया में…..

वो डूबेंगे नहीं

तैरते रहेंगे और

बन जायेंगे पुल

हमारे बीच

 

रिश्ते

रिश्ते जब रिसते हों

और हम जान न पाएं, तो हमें

समझ लेना चाहिए कि

बस, अब अंत निकट है

फिर चाहे जितनी

ऑक्सीजन लगा लो

या वेंटीलेटर पर रख लो

कुछ फर्क नहीं पड़ता

क्योंकि

उनकी नियति में

बस मरना ही होता है !

पता: 3966 चर्चिलल ड्राइव,  Pleasanton CA 94588

सिन्धी अनुवाद:

उछलाए छडि

मुहब्बत जा चार लफ़्ज़

जिंदगीअ जे दरिया में

उहे बुन्दा कींन

तरंदा रहन्दा, ऐं

पुल बणिजी वेन्दा

असांजे विच !

रिश्ते

रिश्ता जहिं टिमन्दा रहन

ऐं असीं जाणी न सघूँ

त असांखे

समझण खपे त

बस, हाणे अंत वेझो आहे

पोइ भले जेतिरी चाहियो

ऑक्सीजन लगाए छडियो

या वेंटीलेटर ते खणी रखो

कुछ फर्कु नथो पवे

छाकाणि जो

तिन जी किस्मत में

बस मरण ई हूंदों आहे !

0

मूल: माया मृग

बूढ़ी औरतें                                                             

बूढ़ी औरतें

मंदिर सिर्फ धर्म-कर्म के लिए नहीं जातीं

मंदिर जाती हैं क्योंकि वे कहीं नहीं जातीं ..

ईवनिंग वॉक पर निकली बूढ़ी औरतें

अपनी पीढ़ी की विद्रोहिणी औरतें हैं

उनका होना, सड़क पर होना

विद्रोह है, भले ही उनके हाथ में ना कोई झंडा है

ना हवा में कोई जोशीला नारा

अब भी बची है संभावनाएं, भले ही ना बची हो उम्र

मरते जाने के लिए नहीं जीतीं बूढ़ी औरतें

जीने के लिए मरती हैं …!

वे चली जाएंगी इसी तरह किसी दिन

जीवन के पार जाती सड़क पर

अपने घुटनों के दर्द के साथ हल्की सी कराह लिए

उनकी कराह में मेरी आश्वस्ति है, कह नहीं सका उनसे

पता नहीं, इस आश्वस्ति को बचाए रखने को

गली की सड़क पर कल उन्हें देख सकूंगा कि नहीं

बूढ़ी औरतें बीता कल नहीं, आने वाला कल भी नहीं

बूढ़ी औरतें जो हैं…. बस आज हैं…!

पता: एफ-77, सैक्टर 9, रोड-11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल इस्टेट, बाईस गोदाम, जयपुर 302006

सिन्धी अनुवाद:

बुढियूं जालूँ

बुढ़ियूं ज़ालूँ

फ़क़त मंदर में धर्म-कर्म जे ख़ातिर न वेंदियूं आहिन

मंदर वेंदियूं आहिन, छो जो हू केडान्हु न वेंदियूं आहिन…!

ईवनिंग वॉक ते निकितल बुढ़ियूं ज़ालूँ

पहिंजी पीढ़ीअ जूं विद्रोही ज़ालूँ आहिन

उन्हन जो हुअण, वाट ते हुअण

विद्रोह आहे, भले ई उन्हन जे हथ में के झंडा नाहिन

न हवा में के जोशीला नारा

अञाँ बि बचियूं आहिन संभावनाऊँ,

भले ई न बची हुजे उमुर

मरी वञण जे लाइ नथ्यूं जीअन बुढ़ियूं ज़ालूँ

जीअण जे लाइ थ्यूं मरन  …. !

हू हली वेन्द्यूं इन्हीअ रीति कहिं डींहु

जीवन जे पार वेंदड़ वाट ते

गोन जे सूर साणु हल्की कीकराट खणी

उन्हन की कूक में मुहिंजी सुहानभूती आहे,

न चई सघ्युस तिन खे

खबर नाहे, इनीह दिलासे खे बचाए रखण लाइ

घिटीअ जी वाट ते सुभाणि उन्हन खे डिसी सघन्दुस या न

बुढ़ियूं ज़ालूँ गुज़रियल माज़ी नाहिन, मुस्तकबिल बि नाहिन

बुढ़ियूं ज़ालूँ जो बि आहिन…बस अजु आहिन..!

0

मूल: मृदुल कीर्ति

कटी पतंग

एक पतंग नीले आकाश में उड़ती हुई

मेरे कमरे के ठीक सामने

अचानक कट कर

खिड़की से दिखते एक पेड़ पर अटक गयी।

नीचे कितने ही लूटने वाले आ गए

क्योंकि पतंग की किस्मत है

कभी कट जाना, कभी लुट जाना

कभी उलझ जाना, कभी नुच जाना

कभी बच जाना, कभी छिन  जाना

कभी सूखी टहनियों

पर लटक जाना।

टूट कर गिरी तो झपट कर

तार-तार कर देना।

हर हाल में लालची निगाहें

उसका पीछा करती है।

कहीं वह नारी तो नहीं?

पता: रेमंड एवेन्यू, रोम, जार्जिया-अमेरिका

 

सिन्धी अनुवाद:                               कटियल पतंगु

हिकु पतंगु नीले आकाश में उडामंदे

मुहिंजे कमरे जे बिलकुल साम्हूँ

ओचतो कटिजी

दरीअ मां नज़र ईंदड़ वण ते अटिकी पियो।

हेठि केतरा लुटण वारा अची व्या

छाकाणि जो, पतंग जी किस्मत आहे

हिं कटिजी वञणु, कहिं लुटजी वञणु

हिं  उलझी वञणु, कहिं पट्जी वञणु

हिं बची वञणु, कहिं खसिजी वञणु

हिं सुकल टारियुन

ते लटकी वञणु।

टुटी करे किरण ते झपटो पाए

तार-तार करण

हर हाल में लालची निगाहूँ

हुन जो पीछो कंद्यूँ आहिन।

किथे हूअ नारी त नाहे?

0

 

 

मूल: नईमा इम्तियाज़ ‘शम्मा’

ए शम्मा-ए-रौशन

ए शम्मा-ए-जहां अफ़रोज तेरा आईना हूँ मैं

तू मोम की बनी, मैं मिट्टी की बनी हूँ !

जीने की अदा तुझ सी, मरने का चलन तुझ सा

महफिल में जली तू,  मैं अपने घर में जली हूँ !

पता: 39 , आर. एन. ए. सफायर, 902 आज़ाद नगर 2, वीर देसाई रोड, अंधेरी-वेस्ट, मुंबई-53.

 

 

 

 

 

 

 

सिन्धी अनुवाद:

ए शम्मा-ए-रौशन

ए शम्मा-ए-रौशन तुहिंजो आईनो आहियां माँ

तूँ मेणु जी ठहियल, माँ मिट्टीअ जी ठहियल आहियाँ

जीअण जी अदा तो जहिड़ी, मरण जी रीत तो जहिड़ी

महफ़िल में रीं तूँ,  माँ पहिंजे घर में री आहियाँ !

0

 

 

 

 

 

 

 

 

मूल: नरेंद्र मोहन

शब्द एक आसमान

लौटता हूँ शब्द में

शब्द में एक कुआँ है

जिसमें झाँकता हूँ

शब्द में एक समुद्र है

जिसमें उतरता हूँ

शब्द में एक आसमान है

जिसमें उड़ता हूँ

झांकना और उतरना और उड़ना

क्रियाएँ नहीं है मेरे लिए

अपने ‘होने’ को पाना है

अनन्त में!

पता: -299-डी,  एम. आइ. जी. फ्लैट्स, राजौरी गार्डन, नई दिल्ली-110027

सिन्धी अनुवाद:

शब्द हिकु आसमानु 

मोटां थो शब्द में

शब्द में हिकु खूह आहे

जंहिमें लीओ पायाँ थो

शब्द में हिकु समुढ आहे

जंहिमें में लहां थो

शब्द में हिकु आसमानु आहे

जंहिमें में उरां थो

लीयो पाइण, लहणु, उडामण

फ़क़त कारवायूं नाहिन मुहिंजे लाइ

पाहिंजे ‘हुअण’ खे पाइण आहे

अनन्त में !

0

 

 

मूल: श्री नरेंद्र मोदी

जाना नहीं

यह सूर्य मुझे पसंद है

अपने सातों घोड़ों की लगाम

हाथ में रखता है…..

लेकिन उसने कभी भी घोड़े को

चाबुक मारा हो

ऐसा जानने में आया नहीं….!

इसके बावजूद

सूर्य की मति

सूर्य की गति

सूर्य की दिशा

सब एक दम बरक़रार

केवल प्रेम…!

पता: सारा देश

सिन्धी अनुवाद:

जातो

ही सिजु मूंखे पसंद आहे

पंहिंजन सतन ई घोड़न जी लगाम

हथ में रखंदो आहे…..

पर हुन कहिं बि घोड़े खे

चाबूक मारियो हुजे

ईंअ जाणण में कीन आयो…. !

इनजे बावजूद

सिज जी मति

सिज जी गति

सिज जी दिशा

सब हिक दम बरक़रार

फ़क़त प्रेम…!

0

मूल: पद्मजा शर्मा

मुझे भी

मैं रुकी, तो तू चल  पाएगा ?

मैं चुप रही, तो तू बोल पाएगा ?

मैं रोई, तो तू हंस पाएगा ?

मैं मरी, तो तू जी पाएगा ?

तू चल

मुझे भी चलने दे

तू बोल

मुझे भी बोलने दे

तू हंस

मुझे भी हंसने दे

तू जी

मुझे भी जीने दे

अब सोच लो

नहीं तो कल पछताओगे !

पता: 15 B पंचवटी कॉलोनी, सेनापति भवन के पास, जोधपुर,(राज)

 

सिन्धी अनुवाद:

मुखे बि

माँ बीठसि, त तूँ हली सघन्दें ?

मैं चुप रहियसि, त तूँ गाल्हाए सघन्दें?

माँ रुनसि, त तूँ खिली सघन्दें ?

मैं मुअसि त तूँ जी सघन्दें ?

तूँ हलु

मूंखे बि हलणु डे

तू  गालाहि

मूंखे बि गालाहिणु डे  

तू खिलु

मूंखे बि खिलणु डे

तू जीउ

मूंखे बि जीअणु डे !

हाण सोचे वठु

न त सुभाणि पछताईंदें !

0

 

मूल: पदमेश गुप्त

बर्लिन दीवार

बर्लिन दीवार का वह टूटा हुआ पत्थर

कल मुझसे बोला,

मुझे इतनी घृणा से मत देखो

मेरे ज़ख्म इतिहास के घाव के मरहम हैं,

मैं तो तुम्हारी हर धार, हर चुभन को

सहने को तैयार था

तुम मुझे तराश कर

ईसा भी बना सकते थे !

बाढ़

बाढ़ आई, बह गए, उसमें गाँव के गाँव

तैरती रही लाशें, उनके बच्चों की,

जो गए थे शहर बांध बनाने!                                         प

ता: संपादक एवं प्रकाशक पत्रिका पुरवाई  UK

 

सिन्धी अनुवाद:

बर्लिन दीवार

बर्लिन दीवार जे उन टुटल पत्थर

कल मूंखे चयो,

मूंखे एतरी नफ़रत साँ न डिसु

मुहिंजा ज़ख्म इतिहास जे घाव जा मरहम आहिन,

माँ त तुहिंजी तिखी धार, हर चुभन खे

सहण लाइ तियारु होसु

तूँ मूंखे तराशे करे

ईसा बि ठाहे सघीं हा !

बोडि

बोडि आई, वही व्या

उन्हींअ में गोठन जा गो

तरंदियूँ रहयूँ लाशूँ , उन्हन जे बारन जूं,

जे व्या हुया शहर में बंद धण ! 0

मूल: पारू चावला

ख्वाब ऐं हक़ीक़त

तूँ ऐं माँ प्यार जा साथी

राह ते हलंदे हिक ब्ये जा रहबर

हिं तो मुखे सँभालियो –

हिं मूँ तोखे झले वरतो

ख़्वाब त रहियो ख़्वाब

हक़ीक़त में छा ईंअ जियूँ था?

पता: 13/B जेठी बहन सोसाइटी, मोरी रोड, माहिम नवजीवन सोसाइटी, मुंबई 400016

 

 

 

 

 

हिन्दी अनुवाद:

ख़्वाब और हक़ीक़त

मैं और तुम

प्यार के साथी

एक दूसरे के रहबर

कभी तुमने मुझे संभाला

कभी मैंने तुम्हें थाम लिया

ख़्वाब तो रहा ख़्वाब

हक़ीक़त में क्या यूँ जीते हैं?

0

 

 

 

 

 

 

मूल: पूर्णिमा वर्मन

उदासी
फिर उदासी की दरारों से
कोई झाँकेगा, कहेगा
आँख धो लो, जल्द ही सूरज को आना है।

समंदर
फिर समंदर
रेत में डूबा हुआ था
धड़कनों के पार
कुछ टूटा हुआ था

आँसू
कभी-कभी तो खुशी में भी
आँख रोती है
कि आँसू, दर्द की जागीर तो नहीं है!

पता: 906 कालिंदी विले, विभूति खंड, गोमती नगर, फैज़ाबाद रोड, सुषमा हॉस्पिटल के सामने। लखनऊ

 

 

सिन्धी अनुवाद:

उदासी
वरी उदासीअ जी डार माँ

कोई लीओ पाईंदो
चवंदों, अखि धोई वठु
जल्द ई सिज खे अचिणो आहे।
समुंढ
वरी समुंढ
वारीअ में बुडल हुयो
धड़कनुन जे पार
कुछ टुटल हुयो।
लुडुक
हिं कहिं त खुशीअ में बि
अखि रुअंदी आहे
लुडुक फ़क़त
दर्द जी जागीर त नाहे !

0

 

 

मूल: पुष्पा वल्लभ

कुछ बि न……

मूँ वटि तोखे डियण लाइ

कुछ बि न आहे

न तनु, न मनु, न अखियूँ

टंग, न पेरु, न बाँह

ऐं न ई ज़बान

जो, ज़बान डे

निभाए न सघंदस !

पता: E-3 Blessed Homes,

37 MCneilroad, Karachi

 

 

 

 

 

हिन्दी अनुवाद

कुछ भी नहीं ……

मेरे पास तुम्हें देने के लिए

कुछ भी नहीं है

न तन, न मन, न आँखें

टांग, न पैर, न बाँह

और न ही ज़बान

क्योंकि, ज़बान देकर

निभा न पाऊँगी !

0

 

 

 

 

 

 

 मूल: डॉ. राजम पिल्लै

विडंबना

ज़ंजीर नहीं बांधती

कड़ी टूटती है!

फूल नहीं झरते,

मिट्टी बिसूरती है!

मीनार नहीं टूटती

बुनियाद हिलती है!

माँ-बाप अनाथ नहीं होते,

वृद्धश्रम में जगह तय हो जाती है!

पता: 601-रामकुंज, आर. के.वैध्य रोड, दादर, प। मुंबई-400028

 

 

 

सिंधी अनुवाद:

विडंबना

ज़ंजीर नथी धे

कड़ी टुटंदी आहे

गुल न छणन्दा आहिन

मिट्टी गुत्जी वेंदी आहे

मीनारो नथो टुटे

बुनियाद लुडंदी आहे !

माऊ-पीऊ अनाथ नथा थियन

वृद्धाश्रम में जहि दर्ज थी वेंदी आहे।

0

 

 

 

 

मूल: राजी सेठ

दुख उनको भी थे

दुख उनको भी थे, मुझे भी

चीरते टीसते सालते उन्हें भी रहे मुझे भी

घट दुर्घट, अरक्षा आघात

उन पर भी रहे मुझपर भी

मेरा दुख महत बना

क्योंकि मेरे पास शब्द हैं

कह पाने के हथियार

सह पाने की अक्षमता

अभी तो वे सब चुप हैं

मैं कह रही हूँ

रचनारत क्या कभी सहता है

हर दुख की संहिता बनाकर रहता है।

पता: एम-16, साकेत, नई दिल्ली-110017

सिन्धी अनुवाद

दुख उन्हन खे बि हुया

दुख उन्हन खे बि हुया, मूंखे बि

चीरींदा, वहंदा, पीढींदा उन्हन खे बि रहया

मूंखे बि

घट अंदर, अमहफ़ूज़ आघात

उन्हन ते बि रहया मूंते बि

मुहिंजों दुख अथाहु बण्यो

छाकाणि जो मूँ वटि शब्द आहिन

चवण जा हथियार

सही सघण जी कोताई

अञाँ त हू सब माठि आहिन

माँ चई रही आहियाँ

रचींदड़ बि छा कहिं सहंदो आहे

हर दुख जा संकेताक्षर ठाहे हलंदो आहे।

0

मूल: रश्मी रामाणी

औरत

औरत खे खबर नाहे

एतरो वधीक चवंदी आहे हुन जी माठ

आखिर, संसार जी

सभिणी खां सुठी कविता आहे औरत!

2

हिक थकल औरत खंयो उभो साहु

पासो वरायो धरतीअ

री पई जबलन जी छाती

ओचितो हिक मासूम बार जो सुडुको

हवा में तरियो

ऐं पखिरजी वई समूरी कायनात !

पता: 30 पालिस्कर कॉलोनी, 201-मानस मैनशन,  इंदौर, 252004

 

 

 

 

 

हिन्दी अनुवाद :

औरत

औरत को पता नहीं

इतना अधिक बोलता है उसका मौन

आखिर, संसार की

सबसे अच्छी कविता है औरत!

2

एक थकी हुई औरत ने ली गहरी सांस

धरती ने करवट बदली

पर्वतों की छाती में पड़ी दरार

अचानक एक मासूम बच्चे का सुबकना

हवा में तैरता रहा

और बिखर गई सारी कायनात !

0

 

 

 

 

 

मूल: रेखा मैत्र

 

उँगलियों की फ़ितरत

 

रेत पर लिखी हुई

तहरीर मिट ही जाएगी

वक़्त के समंदर का

एक तेज़ ज्वार जो आएगा

साहिल की सारी इबारतें

समेटता चला जाएगा

वो और बात है

कि लिखना उँगलियों की

फ़ितरत है

मिटने के डर से

उँगलियाँ कहाँ थमती हैं ?

उन्हें रोशनाई मयस्सर न हो

तो भी वे लिखती हैं

लिखना उनकी फ़ितरत जो है !

पता: 18943 विकी एवेन्यू apt # 62, केर्रिटोस CA 90703

 

 

सिन्धी अनुवाद

आगुरियुन जी फ़ितरत 

 

रेत ते लिखियल

तहरीर मिटजी वेंदी

वक़्त जे समुंढ जो

हिकु तेज़ ज्वार जो ईन्दो

साहिल जूं समूरियूं इबारतूँ

समेटींदों हल्यो वेंदो

इहा बी गाल्हि आहे

त लिखणु आगुरियुन जी

फ़ितरत आहे!

मिटण जे डप खां

गुरियूँ किथे रुकजंदियूँ आहिन ?

तिन खे रोशनाई मयस्सर न थ्ये

त बि से लिखंदियूँ आहिन

लिखणु तिन जी फ़ितरत जो आहे !

0

 

 

 

 

मूल: आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

 

शब्द-सिपाही.

मैं हूँ अदना
शब्द-सिपाही.
अर्थ सहित दें
शब्द गवाही..!

2

तुम्हारा हर सच
गलत है
हमारा
हर सच गलत है
यही है
अब की सियासत
दोस्त ही
करते अदावत !
समन्वयम २०४ विजय अपार्टमेंट , नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१

 

 

सिन्धी अनुवाद:

लफ़्ज़न जो सिपाही.

माँ आहियाँ अदनो
लफ़्ज़न जो सिपाही.
अर्थ साणु डियन
लफ़्ज़ गवाही..

2

तुहिंजो हर हिकु सचु
ग़लत आहे
मुहिंजों
हर हिकु सचु ग़लत आहे
इहाई आहे
जु जी सियासत
दोस्त ई
कन दुश्मनी

0

 

 

  मूल: संतोष श्रीवास्तव

तुम्हारी याद

तुम्हारी याद फिर लगी कसकने
बँधे हुए पन्ने
जिन्दगी की किताब के
फिर लगे उड़ने….!

पस्त
हौसले पस्त हुए

रात भर जागी आँखो मेँ
सुबह को तरसती रही

जलते लम्हों की तपिश मेँ
जाने कितने सूरज अस्त हुए !

पता: 204 Kedarnaath Housing Society, Sec-7, Vishwakarma Chauk, Kandivli (W), Mumbai 400067.

 

 

 

सिन्धी अनुवाद:

तुम्हारी याद
तुहिंजी याद वरी लगी डंगण
धल पन्ना
ज़िन्दगीअ जे किताब जा
वरी लगाडामण….!

पस्त
हौसला पस्त थी व्या
रात भर जागी अख्युन मेँ
सुबुह जो सिकंदी रही

रंदड़ लम्हन जी तपिश मेँ
जाणु केतरा सिज अस्त थी व्या !

0

 

 

 

 

 

 

 

मूल: सरिता मेहता

बदलते सपने

एक सपना था बड़ा होने का

माँ की तरह तैयार होने का,

माँ बन, ममता लुटाने का…

एक सपना था कुछ करने का,

जग में नाम-शोहरत कमाने का,

अखबारों की सुर्खियों में छा जाने का…

अब सपना है बुद्ध सा बनने का,
मोह माया से पूर्णत: विरक्त होने का
सब कुछ छोड़ स्वंय में खो जाने का…

देखा! वक्त के साथ-साथ कैसे बदलते हैं सपने…!

पता: लेक्चरार हिन्दी, राइस यूनिवर्सिटी, ह्यूस्टन, टेक्सास, USA

 

 

 

 

 

 

सिन्धी अनुवाद :

बदिलजंदड़ सपना

हिकु सपनो हो वडे थियण जो

माऊ वांगुर तियारु थियण जो

माऊ बणजी, ममता लुटाइण जो…

हिकु सपनो हो कुछ करण जो

जग में नालो-शोहरत पाइण जो
अखबारुन जी सुर्खियुन में छाइजी वञण जो…

हाणि सपनो आहे बुद्ध जहिडो बणिजण जो,
मोह माया मां पूरी तरह विरक्त थियण जो
सब कुछ छडे पाण में गुम थी वञण जो…

डिसु! वक्त सां गडु– गडु कींअ था बदिलिजन सपना…!

0

 

 

 

 

 

 

मूल: शशि पाधा

जाने क्यों

जाने क्यों आज फिर से भीग गया मन का आकाश !

कोई बदली बरसी होगी, धीमे-धीमे, चुपके-चुपके

कहीं तो बिजुरी सिसकी होगी अँधियारों में छुपके-छुपके

जाने क्यों आज किसी का टूट गया संचित विश्वास !

किरणों की डोरी से बाँधी किसने भेजी होगी पीर

किस की आहें पल भर उमड़ीं, बन कर बरसीं होंगी नीर

जाने क्यों रोम-रोम से आज उठते हैं निश्वास !

धुँधली सी कोई याद पुरानी, अँखियों में घिर आई होगी

बीते कल की साध अधूरी, फिर से जीने आई होगी

जाने क्यों आज अधर पे, मुखरित है सूना सा हास !

पता: 10804, सनसेट हिल्स रोड, रेस्टन, वर्जिनिया, 20190, US

 

 

 

 

सिन्धी अनुवाद:  

अलाजे छो ?

अलाजे छो अञु वरी घिमियलु आहे मन जो आकाश !

का ककड़ी वसी हून्दी, आहिस्ते-आहिस्ते, माठ-माठ में

किथे बिजली सुडुकी हून्दी ऊंदहि में लिकी-लिकी

अलाजे छो अजु कहिंजो टुटो आहे समूरो विश्वास !

किरणुन जी डोर सां बधी कंहि मोकली हूंदी पीढ़ा

कंहि जूं आहूँ पल में उमड़ी, वसियूँ हूंद्यूं बणजी नीरू

जाणु छो रोम-रोम माँ, अजु उथन था सूकरा!

धुँधली का याद पुरानी, अँखियुन में घिरी आई हून्दी

गुज़िरियल कल जी चाह अधूरी, वरी जीअण आई हून्दी

जाण छो अजु चपन ते मुखरित आहे सुञो हास !

0

 

 

 

 

मूल : शलिनी सागर

कूंजड़ी

मुहिंजे घर जी सून्ह मुहिंजी कूंजड़ी

मुहिंजे प्यार ऐं पाबोह सां, अजु नंढे माँ वडी थी

सा अजु पहिंजो घरु वसाइण लाइकु थी आहे

माँ खुशी खुशीअ सां संदस नएँ जीवन

जे शुरूआत जा सपना डिठा

से सुपना अजु साकार थिया,

काल्ह ताईं जा कूँज मुहिंजे घर जी सून्ह हुई

सा अजु पहिंजे वलर खां विछड़ी

वञी बिये वलर सां मिली

ऐं उन वलर जे झुंड में ईंअ रिली मिली वई

जो मुहिंजूं आलियूं अख्यूँ उन वलर में

पहिंजी कूंजड़ीअ खे गोल्हण लगियूँ

गोड़हन सां भरियल आलियुन अख्युन

मुहिंजी अख्युन ते धुंध जी चादर चाढ़े छडी

ऐं आहिस्ते आहिस्ते उन झुंड में

मुहिंजी कूंजड़ी वञी बिये वलर सां

रिली मिली वई, ऐं आहिस्ते आहिस्ते,

मुंहिजियुन अख्युन खां ओझल थी वई !

पता: H-9 Akash Bharti, 24 J.P.Ed. Delhi-92

 

हिन्दी अनुवाद:

हंसिनी           

मेरे घर की शोभा मेरी हँसिनी

मेरे प्यार और दुलार की छांव तले

पली-बढ़ी, आज छोटी से बड़ी हुई

वही आज, अपना घर बसाने लायक हुई।

मैंने खु़शी खुशी उसके नए जीवन

के आगाज़ के सपने देखे

वही सपने आज साकार हुए।

कल तक जो हँसिनी मेरे घर की शोभा थी

वही आज अपने खगवृन्द से

बिछुड़कर और झुण्ड से जा मिली,

और उस नए खगवृन्द के झुण्ड में

यूँ घुल-मिल गई

कि मेरी नम आँखें उस वृन्द में

अपनी हँसिनी को ढूँढने लगी

आंसुओं से तर नाम आँखें ने

मेरी आँखों पर धुंध की चादर डाल दी  ….

और आहिस्ता-आहिस्ता उस  खगवृन्द में

मेरी हंसिनी जाकर रच-बस गई, और

धीरे-धीरे

मेरी आँखों से ओझल हो गई…..।

0

 

मूल: शील निगम

ये आँसू !                                                ये आँसू

पारदर्शी मोती! सतरंगी किरणों से चमक उठते हैं,

जब खुशगवार होता है मन,

मन का ही तो दर्पण हैं ये आँसू।

झूम-झूम जाता है मन,

झर-झर बहते ख़ुशी के आँसू

यादों के झरोखे से उठती है…

मिलन की साँसे-झूम-झूम जाता है मन,

झर-झर बहते ख़ुशी के आँसू, भीग जाता है दामन।

यही आँसू जब बिखरते हैं

यादों में विरह की पीड़ा लिए हुए

टूट-टूट जाता है मन,

झर-झर बहते खून के आँसू

भीग जाता है दामन।

काश! ये आँसू भी अपना रंग छोड़ सकते

रंगीन हो जाता दामन… विरह और मिलन के रंगों से …!

बी-४०१/४०२, मधुबन अपार्टमेन्ट, फिशरीस युनीवर्सिटी रोड, गुलशन कालोनी के पास, अंधेरी (वेस्ट), मुम्बई ६१.

 

सिन्धी अनुवाद

ही लुडुक !

ही लुडुक

पारदर्शी मोती! सतरंगी किरणुन सां चमकी पवन्दा आहिन ,

हिं खुशगवार हूंदों आहे मनु ,

मन जो ई त आईनो आहिन ही लुढुक

बा बहार थी वेंदों आहे मनु ,

झर-झर वहन खुशीअ जा गोढ़ा .

याद जे झरोखन मां उथन था…

मिलण जा उदमा-

बा बहार थी वेंदों आहे \मनु ,

झर-झर वहन खुशीअ जा गोढ़ा, पुसी वञे थो दामन।

इहेई लुडुक जहिं पखिरिजंदा आहिन

यादियुन में विरह जी पीड़ा खणी टुटी पवंदों आहे मनु

झर-झर वहन खुशीअ जा गोढ़ा पुसी वञे थो दामन।

काश! ही लुढुक बि पाहिंजो रंगु छडे सघन

रंगीन थी वञे हा दामन…

विरह ऐं मिलन के रंगन सां …!

0

 

 

मूल: सुधा ॐ ढींगरा

दीप बाँटती हूँ

मैं दीप बाँटती हूँ….
इनमें तेल है मुहब्बत का
बाती है प्यार की, और लौ है प्रेम की
रौशन करती है

हर अँधियारे हृदय औ’ मस्तिष्क को।

मैं दीप लेती भी हूँ, पुराने टूटे -फूटे नफ़रत,

ईर्ष्या, द्वेष के दीप,

जिनमें तेल है कलह -क्लेश का

बाती है बैर-विरोध की

लौ करती है जिनकी जग-अँधियारा।

हो सके तो दे दो इन दीपों को

ले लो नए दीप

प्रेम, स्नेह और अनुराग के दीप

जी हाँ मैं दीप बाँटती हूँ ……।

पता: संपादक-हिन्दी चेतना 101 Guymon Ct. Morrisville-NC-27560, USA –

 

सिन्धी अनुवाद

.माँ डिया विरहाईन्दी आहियाँ

माँ डिया विरहाईन्दी आहियाँ

तिन में तेलु आहे मुहब्बत जो

वटि आहे प्यार जी, ऐं लाट आहे प्रेम की

जा हर ऊंधह खे

दिल खे ऐं दिमाग़ खे

रौशन कंदी आहे !

माँ डिया वठंडी बि आहियाँ…

पुराना भल-टुटल

नफ़रत, हसद, साड़ जा डिया,

जिनमें तेल आहे कलह-क्लेश जो

वटि आहे वेर-विरोध जी

लाट जिनजी कंदी आहे जग-में अंधारो।

थी सघे त ई छडियो इहे डिया

वठो नवाँ डिया प्रेम,

सिक ऐं मुहब्बत जा डिया

जी हा, माँ डिया विरहाईन्दी आहियाँ !

0

 

मूल: सुमीता केशवा

 इश्क़ में

कहते हैं इश्क़ में दुनिया की हर शै

खूबसूरत नज़र आती है

कौन कहता है कि इश्क़ में

इन्सान अंधा हो जाता है?

उगने दो मुझे

उगने दो मुझे

बंजर नहीं हूँ मैं

प्यार से सींचो तो सही!

पता: 2204 क्रिसमन टावर, अकुरली रोड लोखंडवाला, टाउनशिप, कांदिवली E-मुंबई 101

 

 

 

सिन्धी अनुवाद:

इश्क़ में

चवन्दा आहिन इश्क़ में दुनिया जी हर शै

खूबसूरत नज़र ईन्दी आहे

केरु थो चवे त इश्क़ में

इन्सान अन्धो थी वेंदो आहे ?

उसरण डियो मूंखे 

उसिरण डियो मूंखे

माँ वीरान नाहियाँ

प्यार सां आबपाशी त करियो!

0

 

 

 

 

मूल:सुनीता लुल्ला

मै जीवन हूँ                                                                       

वो किरन जो सुबह आती है
वो मैं ही हूँ
शाम ढले जो ढल जाता है
वो मैं ही हूँ
फूल कभी ले कर आता हूँ
वो मैं ही हूँ
और कभी काँटे देता हूँ
वो मैं ही हूँ
सपने बन कर आँखो में जो बस जाता हूँ
और कभी आँसू बन कर बह जाता हूँ
कभी कभी मैं जख्म नये भी दे जाता हूँ
और कभी मरहम बन कर लग जाता हूँ
कभी सवालो के धागो में उलझाता हूँ
कभी सुलझ कर उत्तर नये दे जाता हूँ
सारे रस्ते अगर हो सीधे, थक जाओगे
मोड़-मोड़ पर तुमको जीना सिखलाता हूँ
आँख मूँद कर दिल में झाँको, देखो मेरी कीमत आँको
मै जीवन हूँ।

पता: फ्लैट 403, सरोजिनी ब्लॉक, मेधा रेजोइस, राधा कृष्ण नगर, आतारपुर, हैदराबाद-500048 ,

सिन्धी अनुवाद:

माँ जीवनु आहियाँ

उहा किरण जा सुबुह जो ईंदी आ
ऊहा ‘माँ’ ई आहियाँ
शाम जो जा लहंदी आ
ऊहा ‘माँ’ ई आहियाँ
गुल कहिं खणी ईन्दो आहियाँ
ऊहो ‘माँ’ ई आहियाँ
ऐं कहिं कंडा डींदों आहियाँ
ऊहो ‘माँ’ ई आहियाँ
सपना बणजी अख्युन में जो वसी वञे थो
ऐं कहिं लुडुक बणजी वही वेंदों आहियाँ
हिं-कहिं माँ नवां ज़ख्म बि डींदों आहियाँ
ऐं कहिं मरहम बणजी लगी वेंदों आहियाँ
हिं सवालन जे धान में उलझी वेंदों आहियाँ

हिं सुलझी करे नवां जवाब डींदों आहियाँ
समूरा रस्ता जे सिधा हुजन, थकिजी पवन्दा
मोड़-मोड़ ते तव्हाँ खे जीअण सेखारींदों आहियाँ

अख्यूं बूटे दिल में झांकियों
पोइ मुहिंजी क़ीमत कथ्यो

माँ जीवनु आहियाँ !

0

मूल: सुषम बेदी

टूटना
रिश्ते टूटते हैं, व्यक्ति नहीं
पत्ते टूटते हैं, पेड़ नहीं
क्योंकि,
जब व्यक्ति टूटता है
तो पेड़, पत्ता
कुछ भी नहीं रहता !
पता:  404  west 116 street, Apt-33 New York, NY 10027

 

 

 

 

 

 

 

 

सिन्धी अनुवाद:

टुटणु  

रिश्ता टुटंदा आहिन, माणहू न
पन्न टुटंदा आहिन, वण न
छाकाणि जो,
हिं माणहू टुटंदों आहे
वण, पन्न

कुछ बि न था रहन !

0

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मूल: तारा सिंह

मेरा प्रियतम                                          

बैठो न अभी पास मेरे
थोड़ी दूर ही रहो खड़े, मेरा प्रियतम आया है
दूर देश से बावन साल बाद, कैसे कह दूँ

कि अभी धीर धरो, शशि-सा सुंदर रूप है उसका,

निर्मल शीतल उसकी छाया, झंझा पथ  चलता है वह्,

स्वर्ग का है सम्राट कहलाता
मेरी अन्तर्भूमि को उर्वर करने वाला
वही तो है मेरे प्राणों का रखवाला
जब इन्तजार था आने का, तब तो प्रिय आए नहीं
अवांछित, उपेक्षित रहती थी खड़ी
आज बिना बुलाए आए हैं वो, कैसे कह दूँ कि हुजूर अभी नहीं, दीप  शिखा सी जलती थी चेतन
इस मिट्टी के तन दीपक से ऊपर उठकर
लहराता था तुषार अग्नि बनकर
भेजा करती थी उसको प्रीति, मौन निमंत्रण लिखकर
आज कैसे कहूँ कि वह प्रेमी-मन अब नहीं रहा
जिससे मिलने के लिए ललकता रहता था मन
वह   आकर्षण   अब   दिल   में नहीं रहा!

पता: सम्पादक, स्वर्गविभा, नवी मुम्बई

सिन्धी अनुवाद:

मुहिंजो  प्रीतम

वेहु न हाणे भर में मुहिंजे

थोरो परे ई बीठो रहु

मुहिंजो प्रीतम आयो आहे

परे देश खां, बावंझा सालन खां पोइ, कींअ चवां त

हाणे धीरजु रखु, चण्ड वांगुर मोहीन्दड़ रूप आ उनजो

निरमल थधी आहे उनजी छांव

मींहं–तूफ़ानी रस्ते ते हले थो हू

सुर जो आहे शहनशाहु चवांईंदो

मुहिंजी अन्तर-ज़मीन खे खाद डियण वारो

ऊहो ई त आहे मुहिंजे प्राणन जो संभालींदड़

हिं इन्तज़ारु हुयो अचण जो

हिं त प्यारो आयो कीन

नवणंद, निधकिणी थी बिहंदी हुयस

अञु बिना पुकार हू आयो आह, कींअ चवां त हुज़ूर हाणे न

दीपकन जी प्रेमिका वांगुर रंदो हुयो हींअड़ो

हिन मिट्टीअ जे तन डीए खां मथां उथी

लहराए थी ओस बि अग्नि बणजी करे

मोकिलींदी हुयस हुनखे प्रीत, माठि जी नींड लिखी करे

अञाँ कींअ चवां त हाणे उहो प्रेमी-मन न रहियो

जहिंसां मिलण लाइ छिकिजन्दो रहन्दो हो मन

ऊहो मोह हाणे दिल में न रहियो !

0

मूल: तरसेम गुजराल

कहाँ है टोबा टेकसिंह 

कहाँ है टोबा टेकसिंह

सरहद के इस पार या उस पार

किसे कहेंगे पागल

मृत्युदाता को या जीवन इच्छा को

उन्होने वही किया

जो वे कर सकते थे

ज़मीन पर नहीं

ज़मीर पर लकीर खींचने का काम

पागल भेजे जा सकते हैं इधर

 

पागल भेजे जा सकते हैं उधर

कोई बंदिश नहीं

जहाँ गिरेंगे पागल के निर्दोष आँसू

खून की लकीर खिंच जाएगी !

पता:  444 ए, राजा गार्डेन्स, जालन्धर, 144021

 

 

सिन्धी अनुवाद:

किथे आहे टोबा टेकसिंह 

किथे आहे टोबा टेकसिंह

सरहद के हिन पार या हुन पार

कहिंखे चवंदासीं पा

मृत्युदाता खे या जीअण जी इच्छा खे

उन्हन उहो ई कयो

जो हूँ करे थे सघ्या

ज़मीन ते न

ज़मीर ते लकीरूँ खींचण जो कमु

पाल मोकले था सघजन हेडां

पाल मोकले था सघजन होडां

का बि बंदिश कोन्हे

जिते किरंदा पागल जा निर्दोष लुडुक

खून की लकीर चिटिजी वेंदी!

0

 

 

 

 

मूल: उषा राजे सक्सेना

भुज जे भूकम्प का एक मंजर

सुबह से शाम होने को आई

लाचार मुर्दे, सफ़ेद चादरों में लिपटे

बेचैनी से

अंतिम संस्कार का इंतज़ार कर रहे हैं……!

2

लाशों के पटे मैदान

आंसुओं के उफ़ने सैलाब

मार कर ज़माने को

खुद मर गई मौत

वीरानगी में…..!

पता: सह-संपादक- पुरवाई, लंदन। अध्यक्ष- ग्रेट ब्रिटेन हिंदी लेखक संघ, 54, Hill Road, Mitcham, Surrey, CR4 2HQ. UK

 

सिन्धी अनुवाद:

भुजु जे भूकम्प जो हिकु मंज़रु 

सुबुह खाँ शाम थियण ते आई

लाचार मुर्दा, अच्छ्युन चादरुन में वेढ्हियल

बेचैनीअ साँ

अंतिम संस्कार जो इंतज़ार करे रहिया आहिन……!

2

लाशुन साँ भरियल मैदान

लुडुकन जो लबालब सैलाब,

मारे ज़माने खे

खुद मरी वई मौत

वीरानगीअ में…..!

0

 

 

मूल: वंदना गुप्ता

होती है “लाइफ़ आफ़्टर डैथ” भी

सुना था
लाइफ़ आफ़्टर डैथ के बारे में
मगर आज रु-ब-रु हो गया ………तुम्हारे जाने के बाद
ज़िन्दगी जैसे मज़ाक
और मौत जैसे उसकी खिलखिलाती आवाज़
गूँज रही है अब भी कानों में
भेद रही है परदों को
अट्टहास की प्रतिध्वनि
और मैं सोच में हूँ
क्या बदला ज़िन्दगी में मेरी
और तुम्हारी….जब तुम नही हो, कहीं नहीं
फिर भी आस पास हो मेरे
मेरे ख्यालों में ख्याल बनकर
तब आया समझ इस वाक्य का अर्थ
होती है “लाइफ़ आफ़्टर डैथ” भी  ……अगर कोई समझे तो!

पता: डी -19, राणा प्रताप रोड, फ़र्स्ट फ़्लोर, आदर्श नगर , दिल्ली –110033

 

सिन्धी अनुवाद:

थींदी आहे “लाइफ़ आफ़्टर डैथ” बि

बुधो आहे
‘लाइफ़ आफ़्टर डैथ’ जे बारे में
पर अञु रु-ब-रु थी वयुस ………

तुन्हिंजे वञण खाँ पोइ

ज़िन्दगी णु मज़ाक
ऐं मौत णु उनजो टहिकु डींदड़ आवाज़ु
गूँजजी रह्यो आहे अञां बि कनन में
फाड़े रह्यो आहे परदन खे
उन खिल जो पराडो
ऐं माँ सोच में आहियां
छा बदिल्यो ज़िन्दगीअ में मुंहिंजी
ऐं तुहिंजी ………जहिं तूँ किथे नाहीं
पोइ बि मुहिंजे आस-पास आहीं

मुहिंजे ख्यालन में ख्यालु बणजी !

हिं समझ में आयो हिन सिट जो मतलब
थींदी आहे “लाइफ़ आफ़्टर डैथ” बि  ……जे केरु समझे त !

0

 

मूल: वेद प्रकाश वटुक

हर धर्म युद्ध में

हर धर्म युद्ध में

विजय राम की होती है

पर मुक्ति रावण को मिलती है

और राज्य प्राप्त होता है विभीषणों को

रही सत्य की सीता,

उसे मिलेगी अग्नि परीक्षा

वनवास और धरती में समा जाना !

तुम्हारा दावा

तुम्हारा दावा है दोस्त

कि तुमने सच जिया है

एक बात पूछूँ सच सच बताना

तुम ज़िंदा क्यों हो?

पता: 35/1 कैलाश पूरी, मेरठ (उ. प्र.) 250002।

सिन्धी अनुवाद:

हर धर्म जी लड़ाईअ में

हर धर्म युद्ध में

विजय राम जी थींदी आहे

पर मुक्ति रावण खे मिलन्दी आहे

ऐं राजु मिलंदो आहे विभीषण खे

बची सच जी सीता

उनखे मिलंदी अग्नि परीक्षा,

वनवासु ऐं धरतीअ में समाइजी वञणु !

तुहिंजों दावो 

तुहिंजो दावो आहे दोस्त

त तो सचु जी डिठो आहे

हिक गाल्हि पुछाईं सचु सचु बुधाइजंइ  (+ dot)

तूँ जीअरो छो आहीं ?

0

 

मूल: विम्मी सदारंगानी

माँ ऐं तूँ   

माँ ऐं तूँ                                                                                                                                                                                                    कहिं गडु-कीन हल्यासीं

रस्ते ते हलन्दे

तूँ अगियाँ अगियाँ

णु को धनारु

ऐं

पुठियाँ नोड़ीअ सां धल

कहिं गाइं वांगुरि माँ !

तो चयो                                                                                                            

मूंखे छडे डे

ऐं .. ऐं … मूँ

तुहिंजो हथु अञां मज़बूतीआ सां

पकड़े वरितो हो!

पता: 8 मल्लीर, वार्ड 4/A आदिपुर -770205

 

 

 

हिन्दी अनुवाद :

मैं और तुम  

मैं और तुम

कभी साथ-साथ नहीं चले

रास्ते पर चलते

तुम आगे आगे

जैसे कोई चरवाहा

और

पीछे रस्सी से बंधी

किसी गाय की तरह मैं !

तुमने कहा                                                                                                            

मुझे छोड़ दो

और… और…. मैंने

तुम्हारा हाथ और मज़बूती से

थाम लिया था!

0

 

 

 

मूल: विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
अपने-अपने अजनबी
मैं अपनी इच्छाएँ
कागज पर छींटता हूँ
मेरी पत्नी अपनी हँसी
दीवारों पर चिपकाती है
और मेरा बच्चा

कभी कागजों को नोचता है
कभी दीवारों पर थूकता है।

उसकी पीड़ा                                          

अपनी इच्छा से नहीं आया है वह
न जाएगा अपनी इच्छा से
और जो कुछ भी होगा यहाँ
शायद उसकी इच्छा से नहीं होगा
न कभी हुआ !
उसकी पीड़ा यही है
कि वह सुख भी पाता है
तो दूसरे की इच्छा से।

पता: सहित्य अकादेमी, फेरोजशाह मेहता रोड, दिल्ली ( put comma )

सिन्धी अनुवाद:

पाहिंजा-पाहिंजा अजनबी
माँ पहिंजूँ इच्छाऊँ
कार ते छिटकीन्दो आहियां
मुहिंजी ज़ाल पहिंजी खिल
भितियुन ते चुंबराईन्दी आहे
ऐं मुहिंजो बारु कहिं

कारन खे नूपेड़ींदों आहे
हिं,

भितियुन ते थुक फिटी कन्दो आहे।

हुनजी पीड़ा
पाहिंजी इच्छा सां हू न आयो आहे

न वेंदो पहिंजी इच्छा सां

ऐं जो कुछ बि थींदो हिते
शायद हुनजी इच्छा सां न थींदों
न कड़हिं थ्यो!
इहा हुनजी पीड़ा आहे
त हू सुख बि पाईंदों आहे
बिये जी इच्छा सां ।

0

मूल: सत्तार पीरज़ादो

दांहि ऊनाईं

मूँ कहिं तोखे चयो हो:

तूँ हींअ न करि?

जींअ वणेई तींअ तूँ करि

पर असांजूँ किस्मतूँ

कुछ त बदलाइज खणी।

जे खंया हा हथ असां

ऐं कयूँ मिन्नथूँ अव्हाँ खे

से मञीँ जे तूँ वञीँ

फर्क़ु कहिडो खुदाईअ मँझ ईन्दो,

पर भलो थीन्दो समूरी सिंधु जो

कींअ धरती ठूंठ वई आ बणजी

शाहु दरिया बि व्यो आहे सुकी

रुञ पयो भासिजे संदस ही बेटु बि

जो समूरो खारो थी व्यो आहि

केतरा मिठे पाणीअ लाइ था सिकंदा वतनि

ऐं ज़मींनूँ संढ थ्यूं थीन्द्यूं वञन

बरसात जी हिक बूंद लाइ माण्हूं सिकन

थर वासी र वासी

करालु नाहि हिक्यो

केतरा ई साल थिया

चहिरो न कहिंजो महिक्यो

ऐ ख़ुदा! तूँ तरस खाऊ

मिन्थ कहिंजी त ऊनाइ

मींह खे मोकल डई छडि

प्यो वसे थरु रु मथे

अड़-अत्तर ऐं वसे काछे मथे

जींअ वञे सैराब थी

सिंधु जी हीअ ठूंठ धरती !

पता: फ्लैट 213 C, पार्क एवेन्यू, प्लॉट न. 8 , कराची 75290

 

हिंदी अनुवाद:

फरियाद कर क़बूल

मैंने कभी तुमसे कहा

तुम ऐसा मत करो ?

जैसा चाहो वैसा तुम करो

पर हमारी क़िस्मतें

कुछ तो बदलो!

गर उठाए थे हाथ हमने

तो की मिन्नतें तुम्हारी

वे अगर तुम मान लो

कौन सा फ़र्क पड़ जाएगा ख़ुदाई में

पर भला होगा संपूर्ण सिन्ध का

देखो कैसे ठूंठ बन गई है धरती ?

दरिया शाह भी सूख गया है

मरीचिका लगा रहा है उसका द्वीप

हो गया है तमाम खारा

कितने तरस रहे हैं मीठे पानी को

और ज़मीनें बंजर हुई जा रही हैं

बारिश की बूंद को आदम तरसा

थलवासी, बनवासी

गड़रिया नहीं हुआ हर्षित

कितने साल हैं गुज़रे

चेहरा नहीं खिला किसीका

ऐ ख़ुदा! तू रहम कर

किसी की मिन्नत तो पूरी कर

बारिश को रिहा कर दे

बरसती रहे जल-थल पर यूं

कि नखलिस्तान हो जाए

सिन्ध की यह ठूंठ धरती!

0

 

 

मूल: दीपक लालवानी

मैं रूठा, तुम भी गर रूठे
पहल करके मनाएगा कौन ?

आज दरार जो, कल वो खाई
ऐसी ख़ला भर पाएगा कौन ?

मैं भी चुप गर  तुम भी चुप हो
परत चुप्पी की छेदेगा कौन?

मैं दुखी और तुम भी बिछड़कर,
दिल को दिलासा देगा कौन ?

ना मैं राज़ी, ना तुम राज़ी,
माफ़ी का मूल्य सिखाएगा कौन ?

तुझमें मुझमें अहम् भरा जो
शिकस्त आखिर दिलाएगा कौन?

मूंद ली दोनों ने जो आँखें
मातम कहो मनाएगा कौन ?

डूबेगा दिल दर्द में ‘दीपक’

मंद चराग़ जलायेगा कौन ?

पता: ३, राधेश्याम अपार्टमेंट, पटिया, नरोदा, अहमदाबाद, ३८२३४०

सिन्धी अनुवाद:

माँ रुठस ऐं तूँ बि रुठें जे

वधी अगियाँ मञांईन्दो केरु?  
जु दरार जा, सुभाण खाई

अहड़ी ख़ला भराईन्दो केरु?

माँ बि चुप ऐं तूँ बि हुयें चुप
परत माठ जी भेदीन्दो केरु?

माँ दुखी ऐं तूँ बि त, विछिड़ी
दिल खे दिलासो डींन्दो केरु?

न माँ राज़ी, न तूं राज़ी
मुल्ह बख्शण जो समझाईन्दो केरु?

तोमें मूमें अहम् भरयल जो
शिकस्त आखिर डींन्दो केरु?

पूरी अख जे तो मूं गडुडु

मातम चऊ मनाईंन्दो केरु?

बुडंदी दर्द में दिल जे ‘दीपक’

मंद चराग़ जलाईंन्दो केरु?

0

  देवी नागरानी                                                                                                                                                 

जन्मः ११ मई, १९४१, कराची (तब भारत)

शिक्षाः बी.ए. अलीं चाइल्ड, व गणित में विशेष डिग्री, न्यूजर्सी .

मातृभाषाः सिंधी, भाषाज्ञान: हिन्दी, सिन्धी, गुरमुखी, उर्दू, तेलुगू, मराठी, अँग्रेजी,                                                                                                                                                                                                                                    सम्प्रतिः शिक्षिका, न्यू जर्सी. यू.एस.ए (सेवानिवृत)

 

प्रकाशित पुस्तकें:

सिन्धी संग्रह:

ग़म में भीगी ख़ुशी(ग़ज़ल-2007), उड़ जा पंछी(भजनावली-2007), आस की शम्अ (ग़ज़ल-2008)

सिंध जी आऊँ जाई आह्याँ (कराची-2009), ग़ज़ल—(ग़ज़ल -2012), माँ कहिं जो बि नाहियाँ (कहानी-2016), किताबी समलोचानाऊँ (समालोचना-सिन्धी –प्रेस)

हिन्दी संग्रह:                                                                                     चराग़े-दिल(ग़ज़ल-2007), दिल से दिल तक (ग़ज़ल-2008), लौ दर्दे-दिल की(ग़ज़ल-2008), जन-महिमा (भजनावली-2012)), ऐसा भी होता है (कहानी -2016), सहन-ए-दिल (ग़ज़ल-2016),

The Journey (अंग्रेजी काव्य-2009)

 

अनुवाद:                                                                                 हिन्दी से सिन्धी अनुवाद:

बारिश की दुआ(कहानी संग्रह-2012), अपनी धरती (कहानी संग्रह-2013), रूहानी राह जा पांधीअड़ा (काव्य-2014), बर्फ़ जी गरमाइश (लघुकथा-2014), चौथी कूट (कहानी संग्रह-प्रकाशन-साहित्य अकादमी), आमने- सामने ((काव्य का हिन्दी-सिंधी अनुवाद-2016),  आँख ये धन्य है (नरेंद्र मोदी काव्य -प्रेस )

सिन्धी से हिन्दी अनुवाद:

और मैं बड़ी हो गयी (कहानी-2012), पन्द्रह सिन्धी कहानियाँ(कहानी-2014), सिन्धी कहानियाँ (कहानी-2014), सरहदों की कहानियाँ (कहानी-2015), भाषाई काव्य सौंदर्य की पगडंडियाँ (काव्य-2015), अपने ही घर में (कहानी-2016), दर्द की एक गाथा (कहानी 2016), एक थका हुआ सच (अतिया दाऊद काव्य -2016), क़ायनात की गुफ़्तगू (प्रांतीय-विदेशी कहानियाँ-प्रेस), रूमी–मसनवी (अंग्रेजी से हिंदी-प्रेस),

 

अन्य अनुवाद:

सफ़र- (अङ्ग्रेज़ी काव्य JOURNEY का हिन्दी सिंधी अनुवाद-ध्रु तनवाणी-2016)

सिन्धी कथा (सिन्धी कहानी का मराठी अनुवाद- डॉ. विध्या केशव चिट्को-2016)

 

सम्मान-पुरुसकार :                                                                                                        

अंतराष्ट्रीय हिंदी समिति, शिक्षायतन व विध्याधाम संस्था NY -काव्य रत्न सम्मान, काव्य मणि- सम्मान- “Proclamation Honor Award-Mayor of NJ, सृजन-श्री सम्मान, रायपुर -2008, काव्योत्सव सम्मान, मुंबई -2008,  “सर्व भारतीय भाषा सम्मेलन“ में सम्मान, मुंबई -2008, राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद –पुरुस्कार-2009, “ख़ुशदिलान-ए-जोधपुर” सम्मान-2010, हिंदी साहित्य सेवी सम्मान-भारतीय-नार्वेजीयन सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम, ओस्लो-2011,  मध्य प्रदेश तुलसी साहित्य अकादेमी सम्मान-2011, जीवन ज्योति पुरुसकार, गणतन्त्र दिवस-मुंबई-2012, साहित्य सेतु सम्मान -तमिलनाडू हिन्दी अकादमी-2013, सैयद अमीर अली मीर पुरुस्कार- मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति-2013, डॉ. अमृता प्रीतम लिट्ररी नेशनल अवार्ड, नागपुर-2014, साहित्य शिरोमणि सम्मान-कर्नाटक विश्वविध्यालय, धारवाड़-2014, विश्व हिन्दी सेवा सम्मान-अखिल भारतीय मंचीय कवि पीठ,यू.पी-2014, भाषांतर शिल्पी सारस्वत सम्मान- भारतीय वाङमय पीठ-कोलकता-जनवरी 2015, हिन्दी सेवी सम्मान –अस्माबी कॉलेज, त्रिशूर-केरल- सितंबर 2015,

USA: Devi Nangrani , 323 Harmon cove towers, Secaucus, NJ 07094

mail: dnangrani@gmail.com,

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Facebook
Google+
http://swargvibha.in/onlinemagazine/2018/10/20/501">
Twitter
LinkedIn