ज़ख्म हैं……गम हैं…रुसवाई है

ज़ख्म हैं……गम हैं…रुसवाई है
विपुल तूने अजब शायरी बनाई है

किसी के साथ चलने का है सिला
मेरे हिस्से में अब सिर्फ तनहाई है

हम भी शायर थे आसमानो के सिवा
किसी और से दुश्मनी नही निभाई है

उसने निभाई है यों वफ़ा मुझसे
जैसे आम आदमी की किस्मत में मंहगाई है

मेरे दुश्मन मेरी भी दुआयें तुझे लगे
दुश्मनी सही पर सिर्फ तूने वफ़ा निभाई है।
विपुल त्रिपाठी

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