हमने कितने लोगों को, उतपात मचाते देखा है

हमने कितने लोगों को
उतपात मचाते देखा है,
जीते जी अपना स्वर्ग छोड़
नरक चुनते देखा है।

कितने लोगों को, मानव धर्म छोड़ते देखा है,
बहुतों का यहीं खड़े, मनुष्य परिभाषित होते देखा है,
वे मनुज नहीं पातक हैं, जो नरक यहीं बना लेते हैं,
ईश्वर के दिव्य आँखों को, आँसू से भर देते हैं।

रह जायेंगे खड़े पड़े,अश्वत्थामा से घूमेंगे,
अपनी मौत पर सोचेंगे, मन ही मन घबरायेंगे,
क्यों मनुज रूप में आये ये, जब पशुवत ही लड़ना था,
ईश्वर के वरदानों को, व्यर्थ उतपातों में खोना था।

**महेश रौतेला

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