सुशील शर्मा

मैं रावण
अहंकारी, व्यभिचारी।
लोक कंटक, दुराचारी।
त्रैलोक्य स्वामी।
पतित पथ अनुगामी
प्रसन्न हूँ ।
तुम्हारे युग में
अभ्युत्थित, आसन्न हूँ।
हर एक मुझ जैसा ही
बन जाना चाहता है।
मेरे अवगुणों को
खुद में बसाना चाहता है।

मेरा चरित्र ,
अब राम से ऊपर जा चुका है।
तुम्हारे युग में,
मुझे आदर्श बनाया जा चुका है।
हर तरफ मेरे जैसा शक्तिशाली ,
बलशाली ,कूटनीतिज्ञ
कामनी ,कंचन प्रेमी
लालची ,राजनीतिज्ञ।
बनने की होड़ है।

राम जैसा चरित्र
अब तुम्हारे युग में
वैसे ही धक्के खाता है।
जैसे उनकी प्रतिमा,
कपडे के टेंट में।
अपने ही जन्म स्थान से ,
निर्वासित युगों से।
एक छोटी सी जगह भी,
उस चरित्र को नहीं ,
तुम्हारे देश में।

मेरे पुतले जला कर
फिर बन जाते हो मेरे जैसे।
बहुत गजब के दोहरे चरित्र
निभाते हो।
राम की ऐतिहासिक थाती लिए
मेरे गुणों को आजमाते हो।

राम बनना
तुम्हारे बस में है भी नहीं।
राम प्रज्ज्वलित शलाका है।
रावण गहन तम की शाखा है।
राम सहस्त्र कोटि सूर्य हैं।
रावण मानस हृदय का अधैर्य है।
राम में त्याग है ,तपस्चर्य है।
रावण अलघ्य पापचर्य है।
सुनो राम के साधको।
रावण को न अपने मन में जगह दो।
राम भारत वर्ष के ,
अक्षुण्य पुण्य साध्य है।
राम ,रावण के आराध्य
के भी आराध्य हैं।

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