मन के गुम्बद में

मैंने संकल्प की

एक आवाज लगाई –

कठिन परिश्रम करूँगा

और बड़ा आदमी बनूँगा |

कुछ शांत क्षणों के पश्चात

प्रतुतर में प्रतिध्वनी आई –

तैरने वाला कभी भी

किनारे बैठकर पत्थर नहीं फेंकता ,

और पानी की गहराई नहीं आँकता |

वह तुरन्त पानी में कूद जाता है

तब कहीं तल में जाकर

मोती ढूढकर लाता है ………. |

                                          =  रामचन्द्र किल्लेदार

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