इस तरह मैं जी रहा व्यथा को अपनी छिपाकर

इस तरह मैं जी रहा व्यथा को अपनी छिपाकर।
लौट आया हाथ खाली याचना के द्वार जाकर।
दिनकर ने कीमत वसूली दोस्ती की अपने ढंग से,
छोड़ दिया साथ उसने हाथ को मेरे जलाकर।

 

अमरेश सिंह भदौरिया

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Facebook
Google+
http://swargvibha.in/onlinemagazine/2018/10/18/%E0%A4%87%E0%A4%B8-%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%B9-%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A4%BE-%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%85">
Twitter
LinkedIn