अतिथि सेवा धर्म बड़ा है(बाल कविता )

अतिथि सेवा धर्म बड़ा है
शशांक मिश्र भारती

बहुत पहले की बात है बच्चों
जंगल में दो कबूतर रहते थे
पति-पत्नी का आपसी रिश्ता
प्राणों से प्रिय हो कहते थे

गुटर गूं गुटर गूं दोनों की
उस जंगल में गूंजा करती
मधुर स्वभाव प्रेम की बातें
माखन मिसरी बनके बहती

एक बार वारिश का मौसम
अन्धड़ जोर-शोर से आया
पानी बरसा छम छमा छम
बादल जोर से गड़ गड़ाया

वारिश से भीगे पेड़ पौधे सब
पक्षी बैठे घोसलों में जा अब
जानवर कीट पतंगे छुप गए
वनराज भी गुफा में घुस गए

कबूतर कबूतरी घोसले में
पीपल के पेड़ पर बैठे थे
वारिश उनको भिगो गई
कांप रहे ठण्ड से ऐंठे थे

तभी कहीं से भीगा-भागा
एक शिकारी वहां पे आया
शिकार ही जिसका था कर्म
पीपल की शरण को पाया

भक्षक आज बनकर अतिथि
कबूतरों के यहां आश्रय पाया
जब शिकारी को देखा उन्होंने
कर्तव्य से हृदय भर आया

सोचा अतिथि का सत्कार हो
कबूतर ने पंखों को हिलाया
क्रोध से पत्नी को लाल देख
वह जाने में थोड़ा सकुचाया

कबूतरी मुख पर उंगली रख
जोर से कबूतर पर झिड़क पड़ी
भक्षक है हम सबका ही जो
उसकी सेवा क्यों आन पड़ी

पर कबूतर ने कबूतरी को
अतिथि देवो भव समझाया
भले ही कर्म से शत्रु है मेरा
आज अतिथि बनकर आया

ठण्ड इसकी दूर करने को
मैं आग लेने कहीं जाता हूं
फिर करूंगा भोजन प्रबन्ध
गृहस्थों सा धर्म निभाता हूं

इसके बाद ही वह कबूतर
कहीं से आग लेकर आया
सूखे पत्तों पर उसे डाल
शिकारी को खूब तपाया

शिकारी की आग तापने से
अब ठण्डक तो थी दूर हुई
दिनभर शिकार हित भटका
अतः भूख की पीड़ा खूब हुई

खाने को कुछ न मिलने पर
उसने आग में अपने को डाला
पति के बाद कबूतरी ने भी
आग में गिरकर धर्म निभाया

इस तरह कबूतर-कबूतरी ने
अतिथि धर्म का मान रखा था
अतिथि भले जीवन भक्षक था
अपने धर्म का ध्यान रखा था

यह कथा बच्चों सदियों से
अनेक कवि गाते आये हैं
अतिथि सेवा धर्म बड़ा है
हमको समझाते आये हैं

शशांक मिश्र भारती

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