– अंकुश्री

ब्रज में तड़प रही एक गोपी ने दूसरी गोपी से कहा, ‘‘मथुरा यहां से बहुत दूर नहीं है. लेकिन कृष्ण ने जाने के बाद एक बार ब्रज की ओर ताका तक नहीं. ’’
विरहाग्नि में दहकती दूसरी गोपी ने कहा, ‘‘मात्र कुछ किलो मीटर की दूरी पर ही तो हमारे प्राण बसते हैं. क्यों न हम ही वहां चल चलें ?’’
‘‘जाने की बात तो ठीक है. मगर जाने के बाद वे हमें पहचानेंगे इसमें मुझे शंका है.’’
दूसरी गोपी ने निराशा भरे शब्दों में कहा, ‘‘मगर तुमने इस बात का अंदाज कैसे लगा लिया कि जाने पर कृष्ण हमसे भेंट नहीं करेंगे ?’’
‘‘बात साधारण है ! पहले वे गांव के भोले-भाले कृष्ण थे, अब
वे शहरी कृष्ण हो गये हैं. इसका स्पष्ट प्रमाण है कि ब्रज से मथुरा जाने के बाद उन्होंने हमारी एक बार भी सुधि नहीं ली है.’’
‘‘गांव छोड़ कर शहर जाने वाले की प्रायः यही स्थिति होती है. गांव के भोला-भाला आदमी का भी वहां जाने पर शहरीकरण हो जाता है.’’ एक गोपी ने कहा.
गाल पर हाथ रखते हुए दूसरी गोपी ने कहा, ‘‘ऐसी बात है ? तब तो हमलोगों को उनसे मिलने की आशा छोड़ देनी चाहिये !’’
‘‘हां ! अब कृष्ण का शहरीकरण हो गया है. गांव की हम गोपियों से मिलने की अब उनकी कोई इच्छा नहीं बची होगी.’’
यह बात सुन कर सारी गोपियां चुप हो गयीं.

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