भरी जेठ के सवाल आषाढ़ पी गया
सावन के सवाल भादों टालता रहा !!

ऐसे भी जिया और वैसे भी जिया
सवालों के जंगल मे भटकता रहा !!

तेरा मेरा सवाल ना लिबास ना पर्दा
यूँ नंगा बदन बुत सा दिखता रहा !!

पूछा सवाल पराया हो गया पल में
खुद सवालों मे दिन रात उलझा रहा !!

आईने से पूछा कोई सवाल बाकी हैं
टुकड़े टुकड़े मेरा चेहरा बिखेरता रहा !!

जवाबों का ना मिला समंदर कहीँ
सवालों का पहाड़ ही दिखता रहा !!
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विश्वनाथ शिरढोणकर , इंदौर म. प्र.

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