सियासत-ए-फ़िरदौस

फ़िल्म ‘आँखों देखीं’ के संजय मिश्रा हर चीज़ को अपनी आँखों से देख कर ही उस पर विश्वास करते हैं .सही भी है . तो इस दफे एक जलते सच को जानने की कवायद की हमने जब बीते दिनों कश्मीर जाने का मौका मिला . इन 14 दिनों में टीवी चैनल्स के कानफोड़ू ‘चर्चाओं’ से परे हमने कोशिश की कि हम आम कश्मीरियों का और सुरक्षा महकमे दोनों का पक्ष जान सकें . उस नासूर के बारे . उस समस्या के अलग अलग पहलुओं को समझने की कोशिश करें . हम राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान ,श्रीनगर में रुके हुए थे . कैंपस और कैंपस के बाहर मौज़ूद सुरक्षा कर्मी , वक़ील , शिक्षक , ट्रेवल गाइड , रेस्तरां मालिकों , टैक्सी वालों , संस्थान के दफ्तर में काम करने वालों के अलावा पैरामिलिटरी जवानों -सी आर पी एफ आदि , आर्मी और पुलिस के नज़रिये को भाँपने की और समझने की कोशिश की . स्थानीय अखबारों ,इश्तेहारों में स्थानीय राजनीति के दरोमदारों , कर्फ्यू के रिवाज़ के बीच सूने स्वतंत्रता दिवस की गवाहियों को भी महसूस किया .

उन्हें (कश्मीरियों को ) लगता है – आर्मी जबरदस्ती कश्मीर में मौज़ूद है . फोर्स को अगर वहां से हटा लिया जाए तो ज़्यादा बेहतर होगा . अमन होगा .उनका हमसे सवाल कि देखिये आप कितने सुरक्षित हैं यहाँ वगैरह . कोई कहता है कि आर्मी ही पत्थरबाजी करती है . कोई मानता है कि अगर सरकार की डोर किसी अधिक शिक्षित व्यक्ति के हाथ में होती तो बेहतर होता !

एक दफ़े तो मेरे बॉर्डर रोड्स आर्गेनाईजेशन द्वारा बेहद कठिन दुर्गम सडकों के निर्माण पर आश्चर्य प्रकट करने पर टैक्सी में बैठे एक शख्स तपाक से बोल उठे – ये इनकी नही अल्लाह की मेहरबानी है . सब पहाड़ , मौसम ,कुदरत का है . और बाकी हमारे टैक्स का . बात सही भी थी .पर छुपी हुई.असंतुष्ट असहमति हर उस चीज़ से भी जो भारत सरकार या उसकी सेना के सन्दर्भ में है . एक सुशिक्षित मैनेजर का बेटा नैनोटेक्नॉलॉजी में शोध कर रहा है तो हमारे सवालों पर उनका हमसे प्रतिप्रश्न यह था कि अगर हमारे पढ़े लिखे बच्चों को यूं ही शक के बिनाह पर आर्मी उठा के ले जायेगी तो क्या वो गुस्से में हथियार नही उठाएंगे ? उनके अनुसार वहां की मांग आज़ाद कश्मीर है जिसका मतलब पाकिस्तान और भारत दोनों से अलग होना है न कि पाकिस्तान जाना . ऐसे में अलगावादी दलोँ और नेताओं का पाकिस्तान के प्रति कश्मीर मुद्दे पर सहयोगी के रूप में शुक्रगुज़ार होना , यह सब बहुत कुछ कह जाता है . क्या सियासत और अवाम एकमत नही है . क्या घाटी के आम आदमी जैसे हमारे ड्राईवर मुश्ताक़ के अनुसार शिक्षा और नौकरी की ज़रुरत ज़्यादा ज़रूरी मुद्दा है या फिर हर उस चीज़ के खिलाफ होना जो भारत संघ का सूचक है .

इसी बीच चुनावी सरगर्मियों में एक और गेंद उछाली जा रही है -संविधान के 35 A की . जो जम्मू और कश्मीर राज्य को एक विशेष राज्य का दर्ज़ा देता है . इस ख़ास दर्ज़े और इससे जुड़े आम कश्मीरियों के हितों के चलते वहां के व्यापारियों आदि द्वारा 5 और 6 अगस्त को बंद भी किया गया . सुप्रीम कोर्ट के इस बाबत् फैसले के बाद संभवतः ये हलचलें और भी बढ़ जाएँ . स्थानीय लोगों के अनुसार अगर इसे हटा दिया गया तो बाकि राज्यों की तरह यह राज्य भी भीड़भाड़ वाला हो जायेगा . जंगलों में निज़ी सेक्टर की सेंध लग जायेगीं. इसकी कुदरती खूबसूरती नष्ट होती जायेगी . इसके लोगों के पास पहले ही रोज़गार नही हैं . जो पैदा होंगे ,वे बाहरी लोगों को फायदा पहुंचाएंगे . साथ ही यह तर्क कि यहाँ का क्लाइमेट और पहाड़ी जीवन भी बाहर के लोगों को व्यवसाय इत्यादि के लिए सहयोगी नही होगा !!!

कश्मीरी और इस्लामिक भाईचारे , मेहमाननवाज़ी की खूबसूरती और उसका वास्ता न सिर्फ स्थानीय लोगों का गर्व है बल्कि वह बातों बातों में झलकता भी है . और इसे हमने भी महसूस किया !
खैर आगे चलते हैं और जानते हैं ,काफी मुश्किल हालातों को मुस्तैदी से डील करने वाले सिपाहियों की राय ,उनके अनुभव को .

हमारा वास्ता इस दूसरे अहम ‘गवाह’ से जम्मू श्रीनगर हाईवे पर जवाहर टनल के उस पार हुआ . अमरनाथ यात्रा के चलते पर्यटकों के लिए चप्पे चप्पे पर फ़ोर्स तैनात की गयी है . ऐसे में 35 A वाले विरोध-बंद के कारण बाहर के राज्यों के पर्यटकों की खासकर ज़िम्मेदारी उन्ही की होती है .ऐसा उनका कहना है . हमारे लाख समझाने पर कि हमारा पहुंचना कितना ज़रूरी है . हम दो दिन के सफ़र के बाद यहाँ तक पहुंचे हैं और कल एक बेहद ज़रूरी काम जिसके लिए हम यहाँ आये हैं ,उसकी आखिरी तारीख़ है .वगैरह . पर ड्यूटी सबसे ऊपर होती है .वह भी था . खैर इसी बीच एक जवान कहने लगे कि क्यों आप यहाँ आये हैं . शायद कुछ हमारी सुरक्षा का भाव और कुछ ज़मीनी दर्द .हालांकि मुझे कुछ ऐसी बातें जो मैं यहाँ नही बाँट सकती , थोड़ी आश्चर्यचकित भी कर गयीं ,जो अगले 15 दिनों में और भी सामने आयीं . वजहों और तथ्यों के साथ .

श्रीनगर -सोनमर्ग मार्ग पर स्थित एक जन्नती गाँव में जब हमें फिर से रुकना पड़ा तो एक और जवान ने बताया कि ज़मीनी तौर पर यहाँ कभी भी कुछ भी हो सकता है .तेज़ी से बढ़ते स्थानीय आतंकवाद के कारण , फ़ोर्स पर पत्थरबाजी के कारण उन्हें मज़बूरन उस पेलेट गन का प्रयोग करना पड़ता है जो दुर्भाग्यवश कई ज़िंदगियों को प्रभावित कर चुका है ,पर उनका कहना यह है कि वह तब जब चीज़ें पूरी तरह हाथ से निकल जाती हैं और आत्मरक्षा के लिए इसका इस्तेमाल करना पड़ता है . इस विषय में एक ‘भाईजान ‘ कहते हैं कि वह जो जानवरों को काबू में लाने के लिए इस्तेमाल होता है और वह भी उसके पैर पर मार जाता है ,आखिर उसका इस्तेमाल किया ही क्यों जाए . खैर यह अलग मुद्दा है और इस सन्दर्भ मे मिर्च-युक्त पावा शैल्स को सरकार द्वारा सहमति दे दी गयी है .

हालांकि 35 अ के सन्दर्भ में एक आम राय इनके बीच यह भी है कि इसके हट जाने से कश्मीरियों के अभी तक जो प्रचुर संसाधन हैं ,जिनका ढंग से उपयोग नही हो पा रहा है , उस क्षमता का उपयोग हो पायेगा और राज्य की अर्थव्यवस्था को ही फायदा पहुंचेगा . रोज़गार उपजेंगे . और साथ ही कश्मीरियों और बाहरी लीगों के बीच बेहतर मेलमिलाप होगा जो राज्य के हित में होगा .

एक और बात जो हमने कई ज़मीनी जाबांजों से सुनी वह थी – घाटी में मज़हब को बेहद ज़्यादा महत्त्व दिया जाना . पर शायद मज़हब के असल मतलब को न समझ पाना . कहीं कहीं वे इस वे पर दृढ भी थे कि ये लोग बेहद कट्टर हैं इसीलिए इन्हें यह भी नही समझ आता कि इससे उनके अपने कश्मीरी मासूम भाई बहनों को ही तक़लीफ़ होती है . कुछ ये मानते है कि हिन्दू ऐसा नही करते . हमारे यहाँ यह कट्टरता इतनी सर्वव्यापी नही है .

हालाँकि मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि कट्टरता सभी मज़हबों में रही है ,रहती है जैसे खालिस्तान का मुद्दा ; वर्तमान में धर्म और जाति के आधार पर हो रहा मॉब लिंचिंग का भयानक तांडव और गोधरा , बाबरी जैसे ज़ख्म . मज़हबों के मूल को भुलाने के कारण ही यह परस्पर द्वेष है .अमन तनाव का विपरीतार्थी जो है .
खैर यह समस्या धर्म की बजाय सियासत की अधिक नज़र आती है . इन सबके बीच अक्सर पंचायत के चुनाव नही हो पाते . आम आदमी सर्व शिक्षा अभियान के फायदों के न पहुँच पाने के लिए आवाज़ उठाता है . कहीं सड़कों के गड्ढे और तहसीलदार का महीनों से ख़ाली पद इस सियासत के खेल से ज़्यादा ज़रूरी है . कहीं विश्व बैंक नाराज़ है कि उसके द्वारा राज्य को दिए गए 1500 करोड़ में 40 करोड़ ही 2014 की बाढ़ के पुनर्वास और पुनर्निर्माण में अभी तक खर्च हो पाये हैं . कहीं एक बारिश श्रीनगर को जलमग्न कर देती है . तो कहीं एक आम कश्मीरी को अच्छी शिक्षा और रोज़गार के अलावा कुछ और सोचने का वक़्त ही नही है . और एक ‘शाह फैजल ‘ आतंकवादी हमले में मारे गए अपने पिता के बदले में तरक्की और सृजनात्मक रास्ता चुनता है और राज्य के युवाओं को सिविल सेवा जैसी परीक्षाओं में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है .

कश्मीर का मुद्दा क्या है ,इस विषय से ज़्यादा हम जानना चाहते थे कि वहां मौज़ूद लोग इस बारे में क्या सोचते हैं . मीडिया रिपोर्टों , अखबारों में कई दफे तस्वीर बेहद भयानक नज़र आती है . पर इन बातचीतों के ज़रिये निश्चित तौर पर कोई सारे पहलुओं को न समझ सके पर तस्वीर चिंताजनक भले ही ही हो ,भयानक कम हो जाती है .
फिर फ़िरदौस के इस घुमक्कडी सफर ने हमें सिखाया कि आखिर आम इंसान को क्या चाहिए अमन और काम . और यह भी कि दूर बैठकर ‘ फैसला ‘ सुनाना कितना आसान होता है और पास बैठकर समझना कितना ज़रूरी !

Sparsh choudhury

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