मैं सत्य हूँ…Amit Kumar

मैं सत्य हूँ

तुम्हारी नजर से झलकती

नजारों की तरह नहीं

ना ही अखबारों की तरह

मैं सत्य हूँ

नदी, हवा, पहाड़ो की तरह

सूरज, चाँद और सितारों की तरह

 

तुम तब भी भटकते थे

जब कुछ भी पास न था और

आज भी जब सब-कुछ है

तुम अपूर्ण हो

यही सत्य है

 

मैं सत्य हूँ

मैं मंदिरों में नहीं और

ना ही मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारों में

और रहूं भी कैसे

जब कि पूरा जहां मेरा है

मैं आजाद हूँ

जमीं-आसमान की तरह

 

मैं सत्य हूँ

इन्द्रधनुष-सा

जिसके रंग से कितने रंग

अपने मतलब के बनाए तुमने

और रंगों की तरह ही

कितने नाम दे दिए मुझे

कोई भगवान, कोई अल्लाह

कोई जीसस कहता है

मगर मैं एक ही हूँ

यही सत्य है

 

जिसने रखा मुझे दिल में

मेरी अराधना की

मैं उसी का हो गया

मैं राम में हूँ, रहीम में हूँ

मैं बुद्ध में और महावीर में हूँ

मैं सत्य हूँ इसलिए तो

गीता, बाईबिल, कुरान में हूँ

 

कोई भेद नहीं रखता मैं

यही सत्य है

मैं बारिश में हूँ, तुफान में भी

उषा की किरण से

रात की चांदनी और अमावस तक

मैं ही हूँ

हाँ, मैं हूँ क्योंकि

मैं सत्य हूँ।

 

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