“तुम दोगला ईमान रखते हो साहिब

“तुम दोगला ईमान रखते हो साहिब।
उस पर मुसलमान बनते हो साहिब।।

क़ाफ़िरों को मार कर हूर,ज़न्नत मिलेगी।
कैसी मियाँ तुम कुरान पढ़ते हो साहिब।।

मासूम हाथों में थमा कर बन्दूकें, हथगोले।
नर्म ज़ेहन में क्यूँ ज़हर भरते हो साहिब।।

क्या नस्ल आपकी इस हिन्दुस्तान की नहीं है ।
जो अपने मुल्क से ग़द्दारी करते हो साहिब।।

आपके दिल मे अगर छुपा हुआ कोई चोर नहीं।
तो अपने ही हमसायों से क्यों लड़ते  हो साहिब।।

मज़्ज़िदों से क्यों देते हो बग़ावती फ़तवे।
मदरसों में ये कैसी पढ़ाई पढ़ते हो साहिब।।

मज़हब के नाम पे मरने को तो आतुर हो।
तुम हिन्दुस्तान पर क्यूँ नहीं मरते हो साहिब।।

ये ज़ेहाद नहीं,चाहत है तख़्त की ‘दीपक’।
क्यों फ़रेबी,झूठे जेहादी बनते हो साहिब।।

@ दीपक शर्मा
 
 
 

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