पल पल की खबर वों देते थे जमाने को
हर खबर उन्हे अब बेगानों से मिलती हैं !!

हवा का रुख बदला नसीब बदल गया
पत्थर पे लिखी दास्तां आसुओं से भीगती हैं !!

न रुसवाई ,न ग़िला शिक़वा न रूठना मनाना
मसला इतना हैं हर नजर नजर से झुकती है !!

जख्म देने का शिकवा या दर्द होने का गिला
नजरों के तीर ये ज़िंदगी सहती रहती है ?

बर्फ़ की मानिंद सदमे से वो भी जम गया
तकदीर में ही है ,बर्फ कभी तो पिघलती है !!

चाक हो गये पैरहन जिल्लत जिलालत में
इन पैबन्दों पे कहाँ कोई नज़र पड़ती है ? !!

तनहाई हों या भीड़ , कौन है अपना यहाँ ?
ये मेरी रूह क्यों इन्सानों में ही भटकती हैं ?

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विश्वनाथ शिरढोणकर

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