चिड़ि़याँ प्यारी(बाल कविता )—सुषमा देवी

चिड़ियाँ होती कितनी प्यारी

चहके इनसे बगिया- फुलॅवारी

कभी यह चह -चहाती हैं आँगन में

कभी फूर्र से उड़ बैठे अटारी

गली- कुचे और मोहल्ले में

फुर्र से उड़ती हैं लगें प्यारी

समय सीमा का इन्हें न बन्धन

उड़े अम्बर में छुप जाएं घर अन्दर

सफ़ेद, काला ,स्लेटी रंग प्यारा

लगे गलहरी से नाता है गहरा

तिनका जोड़कर बनाए घौंसला

मेहनत का इनमें अजब है हौंसला

दाना चुग- चुग चैंच भर लाती

नन्ने -नन्ने बच्चों को खिलाती

मोह- ममता से रिष्ता गहरा

सब को देती है,ये सन्देष प्यारा

बच्चे पकड़ने को हाथ बढ़ाएं

झट फुर्र्रे से तू उड़ जाए

देख तुझे सब, खुष हो जाते

तभी तुझे चिड़िया, रानी कहते

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