सुलगते अरमान —डा० श्रीमती तारा सिंह

साँझ ढ़ल आई ,रात काली है बिछनेवाली
नील गगन में विहग बालिका-सी उड़नेवाली
थकी किरण नींद सेज पर सोने चली
मेरी भी झिप-झिप आँखें,जो पलकों में काटती
आई रातें,झुकी झुर्रियों के नीचे सोना चाह रहीं
ऐसे में तुम्हीं बताओ, मैं कैसे सुनाऊँ तुमको
तुम बिन गुजारे दिनों की विरह भरी कहानियाँ

कहाँ से लाऊँ मैं उन फ़ूलों के गुलचों को
जिनके गले लगकर सुनाया करता था मैं
भर्राये कंठ से प्यार की अमिट कहानियाँ
जो मनुज स्वप्न साकार बन,सुनते थे
सुरभि रहित मकरंदहीन जीवन में
कोई सार नहीं,बोलकर देते थे संतावना
दिवस में सूर्य संजीवनी थी,निशि में
सुधाकर बन मिटा्ती तथी ,मेरी वेदना

जब भी मेरे हृदय के निर्जन अकुल
उत्तप्त प्रांत में ,भड़कती थी विरह ज्वालाएँ
परियों के मंजीर सी लगती थी बोलने
बदली बन साँसों में घिर मेरे चितवन को
करती थी हरी,कहती थी राख क्षणिक पतंग को
छोड़ो ,भूल जाओ ,जीवन जलती कहानियाँ

पूछती थी,क्यों जलित अंगार सी तुम अपनी
सारी जलन को अंतर में समेटे रहते हो बैठे
क्या है तुम्हारे उत्तुंग वक्ष की बेचैनियाँ
कहाँ खो आये,जीवन की वो सारी निधियाँ
जिसे ढूँढ़ने ज्वलित शिखा सा तुम
अम्बर- अम्बर, भटकते फ़िरते जहाँ- तहाँ

किसके लिए कामना तुम्हारी,पीड़ा की पुकार
करती, अश्रु बूँद बन तुम्हारी श्रुतियों के
उडुओं से झड़- झड़ कर झड़ती ,क्या है
तुम्हारी इस गुप्त कथा की गूढ़ कहानियाँ

भविष्यत के इस घनघोर तिमिर में
जहाँ दीखती नहीं दीपों की आभा
तुम क्यों अपनी इन्द्रियों पर तलवार
उठाये, खुद को बैलों सा हाँक रहा
कौन रूपसी तुम्हारे प्रणय सेज पर
तुम संग जाग रही ,जिसे तुम
निज प्रीति स्रावित बाँहों में भरने
मुमूर्ष अतीत का तुम देखा करते सपना

किसके दाहक रूप का आलिंगन
तुम्हारे हृदय के प्रणय सिंधु में
वाड़व ज्वलन बन हिल्लोरे लेता
किसकी धूमिल छवि,चंचल सजीव
हो तुम संग करती नव कलना

तुम क्यों सोचते , कभी हम दोनों
दो प्रसून से एक डाली पे,रहते थे सटके
शिशिर पावस संग-संग बिताते थे मिलके
अकस्मात हिलती वसुंधरा की झाँकी
लेकर ये आँधी कहाँ से आयी,जो जाते-
जाते अलग कर गई डाली से टहनियाँ
माटी के भेंट चढ़ गई, मिली थी जो
रंगों की एक दुनिया

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