जहाँ तुम खड़ी है

जहाँ तुम खड़ी है
रेगिस्तान पर परछाई पड़ी है।
वाव, क्या सूंदर दिखती है
मुड़ मत जाना इस कमजोर दिल की तरफ
पहली नाजर में प्यार, फिर जान
तुम पे न्योछावर हो ना जाये।
तुम ही स्वर्गो की परी है या
रेगिस्तान में ही रहती है।
जहां तुम खड़ी है।

इतनी धूप में भी, इस मिट्टी का मुस्कराना
यही राज है, जहां तेरी परछाई पड़ी है।
कदमो को चूमती ये मिट्टी
ये हवा जो तेरे स्पर्श से
इतनी ठंडी हुई जा रही है।
ये मुस्कराती हुई कहती है मुझसे –
क्यों रास्ते में खड़ा है,
जाने दे मुझे उस सुंदरता की तरफ।
 
जहां वो खड़ी है।

मैंने पूछा सूरज से
क्यों मुझपे तू आग बबूला है?
है कोन तू, तेरी क्या औकात है?
ताकने दे अपनी पूरी ताकत से मुझे
तुझे जलना है, जल जा।
तुझे मरना है, मार जा।
नही देखा मैने ऐसी सुंदर परी को
दुनिया में वो एक है।
जहां वो खड़ी है।

उसके होटो का हिलना,
मुझे दिख रहा है।
कहती होगी हवा से वो
ठहर जा, मत चल इतनी आवेस में 
की मेरा दुपटा कहीं उड़ न जाये।
हजारों सालो का ये रेगिस्तान
कहीं फिर समुन्द्र ना बन जाये।
निहारने दे मुझे इस दुनिया को
क्या कोई मुझसे सूंदर है?
जहां बिट्टू खड़ी है।

चंदा बोला उससे
भूल गया हु अस्त होना मैं
जब से तुझे देखा है।
चाहे पूर्णिमा आज नही है।
चाहे बदल जाये ये कालदर्शक
चाहे बदल जाये ये तिथियां
होके आज पूरा फिर आऊंगा मैं तेरे दर्शन को।
बस खड़ी रहना
जहां तुम खड़ी है।

दीपक कुमार वर्मा

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