कूचा- ए- नफरत में कुछ लोग बना रहे हैें रोज चांदी

कूचा- ए- नफरत में कुछ लोग बना रहे हैें रोज चांदी
पागलों की इस फितरत से अवाम बन गई हैंं बांदी
जुमलों से इस भरे तंत्र में,थक गए हम सुनकर मुनादी
हौले-हौले इस सडांध से,जम्हूरियत हो रही है मांदी
उम्मीदों की बाट जो रहे,लेकर बैठे हम समाधि
वे वोटों की फसल काटते,सबको उनने भांग पिला दी
इसकी-उसकी रोटी छिनते,आ रहे जो तूफान ओ आंधी
स्मार्ट-स्वार्थ के इस चक्कर में,श्वानों की गत बना दी
कच्चा-पक्का कुछ नहीं बचा अब,हाशिये पर आ गया गांधी
अमन-चैन कोने पर डालकर,झगड़ों के हो गए हम आदी

Jitendra ved

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