मुल्क के रहनुमां !!

वे मुल्क के रहनुमां उड़न खटोले में उड गये
नंगे भूखे लोगों को बस धूल में मिला गये !!

महज नारेबाजी तोड़फोड़ का ये हुजूम
बेवकूफ इंसा आबादी बढ़ाते चले गये !!

ढोल ताशे पीट रहे मुखियां महकमों के
जर्जर अस्मतों को दीमक सा चाट गये !!

कल तक करते थे गलियों में आवारागर्दी
आज बन्दे सारे ही अचानक खुदा हो गये !!

लूट मार की धूम अब दासता है जुल्मो की
वें खुद ही अपने पाँव कब्र में लटका गये !!

रिश्ता हम प्यालों का हर एहसान चुकाता
लाशों पर बैठ टुकडे इधर उधर फेंक गये !!
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विश्वनाथ शिरढोणकर , इंदौर म. प्र.

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