जब हलाकान करते हैं मुझे,उनके सूखे हलक और तिश्नगी

जब हलाकान करते हैं मुझे,उनके सूखे हलक और तिश्नगी
हर शख्स को मुझमे केवल एक कुम्हार नजर आता है

जब दिखते हैं मुझे मुसाफिरों के पैरों के दर्द भरे छाले
लोगों को मुझ में जूता सुधारने वाला नजर आता है

जब देखता हूँ गरीबों के घर,परिंदों के घरोंदे तोड़ने वाले
मुझे अपनी तूलिका में मुसव्विर नजर आता है

जब सुनता हूँ जुल्म ओ सितम के शिकार लोगों की सदा
मेरी अंगुलियों पर खुद मौसिकार उभर आता है

जब इस्तकबाल करता हूँ सियासती और मजहबी बंदों का
मुझे अपने अक्स में एक गुनहगार नजर आता है

जब लिखता हूँ लोकतंत्र के तीन पायों की बेवकूफी के खिलाफ
मुझे अपने में जम्हूरियत का झंडाबरदार नजर आता है

जितेंद्र वेद

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