बस यूं ही

जंगल है
पर पत्तियाँ नहीं
हैं ढेरों प्लास्टिक की थैलियाँ
लाल,पीली,काली,नीली
कुछ कड़क,कुछ पिलपिली
ढूंढ रहे हैं बच्चे
एक ब्रेड का टुकड़ा
एक पिज्जा का पीस
पेट भरने की कुछ जुगाड़ हो जाएं
 
 
बगीचा है
पर फूल नहीं
इधर-उधर बिखरे हैं
कुछ  सिगरेट के टुकड़े
ढूंढ रहे हैं बच्चे
माचिस की तीलियाँ
इन्हें जलाकर
 आधुनिक होने का अहसास हो जाएं
 
 
अस्पताल है
पर दवा नहीं,डाक्टर नहीं
बिखरी है सलाइन की बोतलें
इंजेक्शन का ढेर
टेबलेट के रेपर
ढूंढ रहे हैं बच्चे इसमें कुछ
जिसे बेचकर शाम के 
खाने की जुगाड़ हो जाएं
 
 
स्कूल है
पर चाक नहीं,शिक्षक नहीं
निकाल रहे हैं बच्चे
फटी टाटपट्टी की सुतली
एक-दूसरे को बांधकर
हंसने-खिलखिलाने का अहसास हो जाएं
 
 
ओ मेरे आका
मंदिर है,मस्जिदहै
पर भगवान नहीं,खुदा नहीं
जूलूस है,हुजुम है
नारे लगा रहे हैं बच्चे
नफरत के दौर में 
कहीं उनकी आवाज
बस यूं ही न खो जाएं

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