कान्हा और घंटी

बाल कृष्ण की लीला किसी को कभी भी समझ नही आई कैसे आती वह थे ही इतने अद्धभुत और भी मनोहारी थीं उनकी लीलायंे। ग्वाल बालों कें साथ खेलते कूदते मस्ती करते और मांखन मिश्री …के दिवाने संग के सारे ग्वाल बाल भी सदा उनके साथ मांखन मिश्री का आनन्द लेते, गोकुल में सारा मथुरा का गोधन था। महाराज कंस उनके संरक्षक ही उस गोरस का उपयोग करने के अधिकारी थे गोकुल वासी सारा दूध, दही, माखन, छाछ पहुॅचाते देते थे, मथुरा, प्रतिदिन का हिसाब भी रखा जाता था । गोकुल के ही कुछ लोग जिनके पास अपना गोधन था वह भी मांखन दूध दही मथुरा जाकर बेच आते वहाॅ भाव भी अच्छा मिलता इसलिये उनके बालक बालिकायें तरसते दूध दही मांखन के लिये….और ऐसे में मनमोहन कृष्ण ही तो थे ,जो इन ग्वाल बालों की दूध दही ही इच्छा की पूर्ति कर उन्हे स्वस्थ व खुश रखते वैसे भी कंस के राज में कितना भी गौरस दोे सब कम था।
राज परिवार तो दूध से स्नान करके भी संतुष्ट नही था पर ग्वाले व ग्वालिने डरती थी कही कोई सवाल न उठ खडा हो और ऐसे ही एक दिन कान्हा ने सुबह से ही माखन दही खाने का कार्यक्रम बनायां सभी गोप ग्वालों को तैयार किया तभी गोकुल के संारे ं वानर भी तैयार हो गये। वैसे भी दही माखन की चोरी करना रोज की बात थी ग्वालिने भी कमर कस कर तैयार बैठी थी।इस माखन चोर को रंगें हाथों पकड कर याशोदा को उसका नटखट कान्हा की करतूत बता कर ही मानेंगी …..। सोचा एैसा सबक सिखायेगी कान्हा को कि आज के बाद माखन चोरी भूल जायेंगा।बस फिर क्या था किसी ने रस्सी ली कान्हा को बांधने के लिये किसी ने फंदा बनाया किसी ने छडी हाथ ली मारने को और तो और एक ग्वालिन ने सलाह दी सारा माखन एक जगह रख कर उसके पास एक घंटी भी लगा देते हैं…. कान्हा की टोली जब आकर माखन को छुयेगी तभी घंटी बज उठेगी और हम पकड लेंगे उस माखन चोर को और तभी यशोदा मानेगी की उसका कान्हा माखन चोर हैं। बस फिर क्या था…. एक घंटी मटकियों के पास ही बांध दी ऐसे कि मटकी के हाथ लगाते ही घंटी बज उठगीे…. दोपहर के समय जब सारी गोपियां घंटी के भरोसे आराम से दोपहर में विश्राम करने लगी… तभी सारे गोप कुमारो को ले कान्हा ने ग्वालिन के घर घावा बोला एक एक करके सारे ग्वाल पहॅुच गये ग्वालिन के चैके में और तभी सुदामा की नजर पडी घंटी पर बोला…. देखो कान्हा घंटी लगाई है… हमें पकडने के लिये…..कान्हा ने कहा अच्छा……और कान्हा तो था ही जादुगर….कान्हा ने घंटी से कहा देख री घंटी हम सभी मांखन और दही खा रहें है …खबरदार हैं जो तुमने आवाज कि हैं …..घंटी चुप… ं और सबने भर पेट मखन्न खाया। कान्हा देते जाते बालक सभी खाते जाते इस तरह एक एक बालक और यहाॅ तक की वानर सभी तृप्त हो गये तब अन्तिम कौर बचा था। कान्हा ने सोचा चलो इतना ही सही और कौर मुख में रखने लगे की घंटी बज उठी टना टन टन अरे…. कान्हा ने डपट लगाई चंुप्प… अब खबर दार है जो ……आवाज करी हैं ता,े घंटी भी भयभीत सी बोली…. क्या करूं ठाकुर मंदिर में ठाकुर का भोग लगे तब मुझे बजने की आदत है…ं इसलिये आदत वश बज उठी उसमें मेरा क्या दोष… कान्हा तुमने माखन मुंह से लगाया और मैं आदत वश बज उठी अब तुम्ही कहो क्या करू….? कान्हा ने कहा.. आज तो जो है,सो ठीक हैं पर आज के बाद बजाने पर ही तुझे बजना हैें घ्यान रखना और एैेसा कह कर ठाकुर ने घंटी को माफ कर दिया।
तब से मंदिर में ठाकुर जी के भोग लगाते समय घंटी को बजाया जाने लगा।
प्रभा पारीक

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Facebook
Google+
http://swargvibha.in/onlinemagazine/2018/09/22/%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%B9%E0%A4%BE-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%98%E0%A4%82%E0%A4%9F%E0%A5%80">
Twitter
LinkedIn