किसी की चाहत को ही गुनाह मान लिया
किसी की नफरत को ही एहसान मान लिया !!

 

चाहत हो एहसान हो नफरत हो गुनाह हो
उसकी मोहब्बत को ही खुदाई मान लिया !!

 

न इसके मन मे था न उसके घर मे था
दो कदम साथ को ही हमसफर मान लिया !!

 

यादो की तस्वीरे और तस्विरो मे खोजती यादे
खंडहर दिवारों मे ही बसेरा मान लिया !!

 

मौत भी झरोके से छन छन कर आ रही है
डरे सहमे पलों को ही जिंदगी मान लिया !!

 

इस उम्र का उस उम्र को ता उम्र सलाम
दोज़ख की जिंदगी को ही जन्नत मान लिया !!

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विश्वनाथ शिरढोणकर , इंदौर , म.प्र.
—-
दोज़ख = नर्क

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