खून जब बेगाना हो जाता है,
रूठा रूठा जमाना हो जाता है
नन्हा जब किलकारी  भरता था,
अम्मा उसकी बावली हो जाती थी……
अनमन होता नन्हा,लेती बलैया
नजर उतार मिर्च सुलगाती थी
नहीं उठती झार जब,होती उदास
बबुआ को लगी थी नजर गहरी
अंचरा मे  छिपा मोती बहाती थी…..
खुद गीले बबुआ  को मखमल जैसे
बिस्तर पर सुलाती थी
भले बेचारी हो भूख से लथपथ
राजा बाबू को छाती चूसाती थी
जान बबुआ मे बसती उसकी
तनिक ना हो तकलीफ बावली
बबुआ की साया बनी रहती थी
अम्मा हर बला से दूर रखती थी…….
बाप की सुन लो तनिक कहानी
सूली  का जीवन, पल पल  परेशानी
लालन पालन मे नहीं कोतहायी
खुद को गिरवी रख -रख कर
ऊंची ऊंची तालीम दिलवाई
खुद के पांव खडा हुआ क्या
बबुआ ने ऐसी दुलती लगाई
अम्मा गिरी  निढाल बाप ने
होश गवाई…………
आंखों का तारा उगलने लगा अंगारा
अम्मा पर आरोपों की बौछार
घर उजाड़ने की साजिश
कहता अम्मा बाबू करते ऐश
बबुआ की परिवार विरोधी तैश
बाप पर सौतेलपन का आरोप
टूट गई कुनबे की कमर,
सुन बबुआ का आरोप…….
बहुरूपिये की बेटी बहुरिया
आते ही कैकेयी का रुप धर लिया था
बबुआ  की सासू मंथरा हुई
ससुरा ने लालघर का स्वर तेज किया …..
बबुआ गरजे ऐसे बरसे बारुद जैसे
दोषी निरापद अम्मा बाबू हारे
बहुरिया कैकेयी विहसी,
हुए निराश्रित अम्मा बाबू बेचारे……
बूढी बूढे  थाम हाथ बोले
बबुआ तुमने फेंक दिया बीच राह
पूरी हुई बहुरिया कैकेयी की चाह
तेरी खुशी के लिए मंजूर हमे वनवास
बबुआ तू छुये तरक्की के आसमान
अपना सपना यही,यही आस विश्वास
दुनिया की हर खुशी मिले तुझे बबुआ
तूने जो अपने मांबाप संग किया जैसा
तेरे संग न हो वैसा
ये भी लेते जा दुआ…………
डां नन्द लाल भारती

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