कितने घर उजड़ गए

कितने घर उजड़ गए, कितने
जलकर मिट्टी में हुए लीन
कितने परिवार विखण्डित हो
धन, वैभव से हो गए दीन
कितनों की मर्मकथा सीने में
ही रह गयी व्यथा बनकर
कितनों की जमुना बह निकली
आँखों से करुण कथा बनकर
कितने रोटी को तरस गए
कितने सो गए बिना पानी
कितनों पर आसमान टूटा
कितनों पर छत, छप्पर छानी
कितने गल गए जमाने के
प्यासों के हेतु कुँआ होकर
कितने प्रतिशोध न ले पाए
उड़ गए विचार-धुँआ होकर
कितने कवियों की कविता में
आँतो की क्षुब्ध क्षुधा बरसी
कितने बादल बरसे, कितने
संतो की ज्ञान-सुधा बरसी

 

कितने जनसेवक इस पृथ्वी पर
दीप जलाए घूम – घूम !
लेकिन फिर भी न मिटा अब तक
अन्याय-तिमिर , आतंक-धूम !

 

कितनी साँसे रुक गयीं अतः
कितनी सिसकी हो गयीं शान्त
कितने मस्तिष्क अचेत हुए
कितने मानस रह गए भ्रान्त
अपने शहीद जनकों को दी
कितने मासूमों ने पावक
दो बूँद अश्रु भी गिर न सके
कितने छोटे थे वे बालक
कितनी अबलाओं के दिल में
जीवन भर उठती रही हूक
बेसुध, बेदम ही रहीं सदा
भूली सुध-बुध-सुख-प्यास-भूख
लब से न आह भी निकल सकी
नयनों में पानी भर आया
जब देखा माँ ने सुत शहीद
आँचल में दूध उतर आया
कितने सच के साम्राज्यों में
षणयंत्रों ने चिंगारी दी
कितनों को तो निज रक्षा की
ईश्वर ने एक न बारी दी

 

निज राष्ट्र धर्म के लिये चढ़े
कितने फ़ाँसी की डोर चूम!
लेकिन फिर भी न मिटा अब तक
अन्याय-तिमिर आतंक-धूम !!

 

जो हाल देश का आज हुआ
इस हेतु तो वे न मरे होंगे
अब स्वर्ग लोक में भी उनकी
आंखों में अश्रु भरे होंगे
मन होता है इस भ्रष्ट व्यवस्था
को कर डालूँ नष्ट भ्रष्ट
लिख दूँ इतिहास उजाले से
सर्जित करके कुछ नए पृष्ठ
समता के बीज रोप जाऊँ
विहँसें जिस पर प्यारी नस्लें
मानवता के हित काट धरूँ
ये सारी बारूदी फसलें
पर अपनी सीमाओं को लख
मन का धीरज खो देता हूँ
एकान्त बैठकर चुपके से
पर, जी भरके रो लेता हूँ
चिंतित हूँ लगातार प्यारे
भारत! कैसे क्या और करूँ
कैसे महनीय पूर्वजों का ऋण
अदा करूँ, उद्धार करूँ
हे ईश्वर , इतनी दो सुशक्ति
आँसू से पावन सीप बनूँ
जिनके जीवन में अंधकार
उनकी कुटिया का दीप बनूँ

 

सुख शांति रहे , सन्तति गाये
समता के शुभ पद झूम झूम
प्रभु शेष रहे ना अब जग में
अन्याय-तिमिर , आतंक-धूम!

 

© अनुराग ‘अतुल’

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