॥ तुम कैद हो अँधियारे कमरे में ॥*

तुम कैद हो किसी अँधियारे कमरे में
दरवाजे को भीतर से जड़ा गया है
भारीभरकम एक ताला
नहीं है एक भी खिड़की कमरे में
एक सुराख है छत मे साँस लेने के लिए
जिससे आती है हवा और उजाले की एक बुँद
जैसे-जैसे चढ़ता है सूरज
उजाले की बुँद घूमती रहती है कमरे में
उतना ही होता है तुम्हारा आसमान
जितना कि उस सुराख से देख सको तुम
रात्रि के काले गहन अँधेरे में तो
स्वयं को टटोलकर जाँचने की
आदत-सी हो जाती है तुम्हें
तुम्हें जिंदा रखने हेतु
इंतजाम किया होता है
जरूरी भोजन और पानी का
कमरे में रखे हुए है
भगवत गीता, गांधी, मार्क्स, अंबेड़कर के ग्रंथ
और कविता की एक पुस्तक
तुम्हारा चश्मा भी निकाल लिया गया है
तुम किताबों को सिरहाने रखकर सोते हो
बाहर से सुनाई देती हैं तुम्हें चीखें और सिसकियाँ
कभी कभार दरवाजे पर होती है आहट
तुम थक जाते हो दरवाजे को पीट-पीटकर
पटकते हो हाथ पैरों को
दीवारों से टकरा-टकराकर अपना सिर
हो जाते हो लहुलूहान
अब तुम पागल होने की
और मौत की राह देखते
पुकार उठते हो अपने ईश्वर को

सच तो यह है कि
ताले की चाबी तुम्हारी ही जेब में है
और इस हकीकत को छूपाया जाता है तुमसे !

मराठी कविता *:भगवान नीले*
हिंदी अनुवाद : *सुनीता डागा*

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