शिक्षामित्रों के फैसले पर मेरी रचना-

हे न्यायाधीशों यह तुमने कैसा न्याय  दिखाया है,
भोले भाले शिक्षामित्रों को असहाय    बनाया है।

चौदह वर्षों की उनकी सेवा का यह परिणाम दिया,
कितने घर के दीप बुझे, कितनों का काम तमाम किया।

वे अयोग्य थे तो फिर उनको पहले नहीं हटाया क्यों?
चौदह वर्षों तक उनसे बच्चों को फिर पढ़वाया क्यों?

चौदह पीढ़ी को होते बर्बाद देखकर मौन रहे,
इस अक्षम्य भूल का भी तो आखिर कोई दंड सहे।

शिक्षामित्रों के द्वारा पढ़कर जिसने डिग्री पाई,
वो भी गलत हुईं उनको भी जब्त करो मेरे भाई।

वह पैंतिस सौ पर कैसे अच्छे थे, यह भी बतलाते,
तीस हजार मिले तो बुरे हुये क्यों यह भी जतलाते।

आज पेट में दर्द हुआ क्यों कल भी यही कहानी थी,
क्यों न नौकरी उनकी चौदह वर्ष पूर्व ही जानी थी।

यही न्याय है तो फिर इससे आस्था तो उठनी ही है,
इस अदूरदर्शी निर्णय से निष्ठा तो घटनी ही है।

हार गई मानवता फिर से कुटिल कुतर्कों के आगे,
चलो न्याय के रक्षक आखिरकार नींद से तो जागे।

चलो अपार बधाई, मुँह से कौर छीनकर लाये तो,
चौदह वर्षों बाद सही ही हुआ होश में आये तो।
    -गौरव शुक्ल
     मन्योरा

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