बदले है रंग क्यों ,,,

बदले है रंग क्यों तूं हां ? मौसम की तरहा !
हमने चाहा हैं तुझको धड़कन की तरहा।

उलझ़ गया हूं मैं सयानो की बस्ती में,
लुप-चुप खेले आ फिर हम बचपन की तरहा।

बिखर गए सब तिनके मेरे आश् याने के,
बूने थे ख्व़ाब कुछ मैंने मख़मल की तरहा।

पढ़ पाओ तो पढ़ लो ना सलवटे चेहरे की!
था कभी मैं भी साफ हा दरपन की तरहा।

ढुंढोगे कैसे तुम ? आसाँ तो ना है ये!!
हूं ग़ुबार जैसें मैं पल दो पल की तरहा।

छोड़कर मुझको गयाहै वों जबसे “हुसैन”
मैं तन्हा था मैं तन्हा हूँ हां कल की तरहा ।

– हुसैन गाहा ,” हुसैन”

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