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स्वर्गविभा :   अन्तरजाल  पत्रिका










 

 

जिन्दगी के रुप ...विनोद यादव "निर्भय

 

 

कभी आँसू,कभी मोंती,कभी ईनाम जिन्दगी|
कभी शबनम,कभी शोला,कभी पैगाम जिन्दगी||
कौन समझा,कौन समझेगा अनबुझ वक्त की भाषा,
कभी फूलों की जयमाला,कभी बेदाम जिन्दगी|

 

 

ग़म में बैठो तो ग़मों की बौछार जिन्दगी|
खुशियाँ बाँटो तो खुशियों की औजार जिन्दगी||
जिन्दगी तो नाव है हिलती ही चलेगी,
नज़रिया हो बुलन्द तो चाँद के पार है जिन्दगी|

 

 

उद्धम किया तो देती है पुरस्कार जिन्दगी|
बैठे रहे तो देती है धिक्कार जिन्दगी||
जो ला सका खुशियाँ ग़मों में डुबे चेहरों पे,
बताती है उसे ईश्वर उसे अवतार जिन्दगी|

 

 

स्वतंत्रता मिल गयी पर कर रही कुछ याद जिन्दगी|
शहीदों नें किया अर्पण हुई कुर्बान जिन्दगी||
गुलामी में घिरा भारत हुई अपमान जिन्दगी|
ये धरती का तिलक "निर्भय" जरा पहचान जिन्दगी||

 

 

 

~ विनोद यादव "निर्भय"

 

 

 

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