TOP BANNER

TOPBANNER







flower



mar 2017
कविताएँ 

आलेख

गज़ल

गीत

मुक्तक

हाइकु

कहानी





संस्थापिका एवं प्रधान सम्पादिका--- डॉ० श्रीमती तारा सिंह
सम्पादकीय कार्यालय--- --- 1502 सी क्वीन हेरिटेज़,प्लॉट—6, सेक्टर—
18, सानपाड़ा, नवी मुम्बई---400705
Email :-- swargvibha@gmail.com
(m) :--- +919322991198

flower5

rosebloom





 

 

 

उज्ज्वल-- राकेश जोशी  

 

 

उज्ज्वल, ‘उज्ज्वल-पेपरवाला’ नाम तो सुना होगा आपने, साहेब प्रातकालः दिल्ली के इस चौराहें से गुजरोगे तो अपने आप उज्ज्वल से मिल ही लोगे । देखने मे बिल्कुल दुबला-पतला बिस्कूट सा हैं , लेकिन असल में वो ऐसी टॅाफी है जिसकी मिठास हर फ्लेवर मे भाती है । उस चौराहे से प्रात:काल गुजरने वाले सभी (vip व सामान्या) लोग उससे पेपर खरीदते व पढ़ते है। साथ ही उससे प्रात:काल राम-राम कर, अपना दिन शुभ बनाते है।
साहेब, वैसे तो उज्व् हील १२-१३ का होगा। लेकिन बड़ो-बड़ों से भी ज्यादा मेहनत, साहस, धैर्य, आदि गुणों को अपने मे समेटे रखता है। माँ घर में ही रहती है तथा फूलों की माला बनाती है। जिसे छोटावाला ‘कालू’ बेचता है। उज्व् ल और कालू दो भाई है। दोनो से उनके पिता के बारे मे मत पुछिये नहीं तो रो पड़ोगे। इनकी झोपड़ी कॉलेज के बायीं तरफ के नाले के किनारे में हैं। वैसे तो कभी-कभी हवा के साथ बास यहाँ तक आ जाती है। मगर न जाने ये लोग वहाँ कैसे बसे हुए हैं।
उज्व्े नल चौराहे पर प्रातकाल: से ही न्यू जपेपर बेचता है। वो भी पूरे ६ तरह की भाषा के पेपर । हिन्दीक, तमिल, अंग्रेजी, उर्दू, उड़िया आदि भाषाओं में। इस चौराहे से आने-जाने वाले कई मुसाफिरों व वाहनचालकों से उसकी गहरी दोस्तीज है। उसकी इस खुबी का राज़ उसकी अपनी प्रसन्लचटी है, आखिर कई सारी बोलियाँ बोलता है। तथा कई देशी- विदेशी अॅफसर लोग भी उसे अच्छाइ मानते है। जो अक्सनर सड़क से गुजरते समय उसे कुछ गिफ्ट दे जाते हैं। उज्व्ी अल, पूरे दिन अपनी मेहनत मे लीन रहता है। सुबह अखबार बेच माँ के साथ फूलमाला बनाने मे मदद् करता है तथा उन्हें् कालू के साथ बेचता भी है। कालू भी दोपहर मे चौराहें के किनारे रैड सिग्नसल पर करतब दिखाता है।
उज्व्ा उल से अन्यथ मुसाफिरों की तरह हम तीन दोस्तच भी प्रात: काल ही मिलते हैं। अपनी तो उससे गहरी फ्रेंडशिप है। साहेब, अगर उसकी एजुकेशन की बात करे तो ए बी सी डी भी लिख नहीं सकता। मगर ‘द हिन्दू:’ के मोस्टो पॅापुलर हैडलाइन्स् पढ़कर ‘द हिन्दूक’ बेचता है। ये तो कुछ नहीं साहेब तमिल, और उर्दू, के न्यूैजपेपर भी पढ़-पढ़कर बेच देता है। ऐसे कई किस्से सुबह की चाय के दौरान वो हमें सुनाता है। हम तीन क्लानसमेट की सुबह की चाय उस चौराहे पर उज्व्से ल के साथ ही होती है। चाय की चुस्कीं के बीच ही हमने उज्व्क ल के बारे मे काफी कुछ जाना हैं। हम तीन दोस्तों मे एक कम गंभीर है । वह अधिकतर समय हमसे मजे लेता रहता है। अपने खुरापाती दिमाग को चलाता रहता है । एक दिन तो उसने मजे-मजे मे उज्व्से ल से यह तक पुछ दिया कि ‘ हीरो महिने मे कितने छाप लेता है?’ तब उज्व् मजल का रिपलाइ भी बड़ा अलग-सा था। उसने कहा कि ‘ साहेब पूरे २१०० का कोटा पूरा करता हूँ।’ इसी तरह पिछले हफ्तें मैंने भी उससे पुछ लिया कि ‘ऐ उज्व् ल तेरे पिछले शुक्रवार की फोटो वाले नेता का क्याा हुआ?’ पिछले शुक्रवार उसके ही पास पड़े अधिकतर पेपर के फ्रन्ट पेज पर उसका नेता जी के साथ फोटो छपा था। वो भी राष्ट्री य स्तीर की पार्टी के बड़े नेता के साथ, जिसने कई वादे भी उससे किए सिर्फ पेपर के काले अक्षरों में, तथा पत्रकारों के कैमरों के भीतर । अब तक उस नेता की तरफ से कोई हेल्पे उज्व्न ल के लिए नहीं हुई है। वैसे भी उज्व्ारोल ने कई बार बताया है कि कई नेता-वेता, मंत्री-संत्री से मिला है । सब-के-सब उसके न्यूजजपेपर बेचने के अंदाज से काफी प्रभावित है। तरह-तरह के प्रश्नत उससे पुछते रहते है जैसे ‘स्कूलल क्योंई नहीं जाते हो?’ , ‘क्याा पढ़ना जानते हो?’ , और जब वह पढ़कर दिखाता है । तो बोलते है ‘ तुम्हें पढ़ना चाहिए। तुम पढ़ो स्कूलल जाओ, हम तुम्हाहरी मदद् करेंगे।’ तरह-तरह के वादे करते है। इनके अलावा भी कई संस्था एँ यहाँ आती है। उज्व्म तल जैसे कई अन्यह उज्व्ंगेलों से मिलती है । इनसे बातें करती है , वादे करती है फिर दो-चार दिन इनकी जिन्द्गी अपनी तरह से चलाती भी है। लेकिन, फिर इनकी मजबूरी इन्हें इसी चौराहे पर लाकर खड़े कर देती है
अरे हाँ, उसकी एक और बात तो बताना ही भुल गया। हमनें, मंत्रियों ने, नेता-वेता, रिपोटरों, संस्थार वालों ने आदि कई लोगों ने उससे कई बार पुछा कि ‘ बड़े होकर क्याम बनोगें?’ तो, उसका हर बार एक ही जवाब था ‘साहेब बड़ा होकर मैं डाक्टसर बनूगाँ। अपने पिता के जैसी खतरनाक बीमारी से ग्रसित मरीजो का इलाज करूगाँ और तब तक उनका इलाज करता रहूगाँ जब तक की वो ठीक नहीं होते।‘ सुनने मे यह बात जरूर संवेदनशील लगे । साहेब मबर इसके पीछे उसकी संवेदनशीलता नहीं बल्कि उसका दृढ़संकल्पा था। जो हमें सीधे उससे जोड़ता है। अखबारों के कई लेख जो बीमारी से संबंधित होते थे। उन्हें काट-काटकर वह अपने पास रखता था तथा हमसे उन बीमारियों की चर्चा करता था जैसे एक रोज मधूमेह की चर्चा हुई थी। साहेब उज्व्क ल की इन्हीम खूबियों ने हमें हमारी डाक्टथरी (पढ़ाई) की तरफ ध्याजन केन्द्रि त करने के लिए बाधित किया। उसी का परिणाम है कि आज हम तीनों सारे सेमेस्ट‍र क्लेरयर कर चुके है।
इसी चौराहे के ठीक पीछे लगभग ४०० मीटर की दूरी पर एक केन्द्री य विद्यालय है। जहाँ कई विद्यार्थी पढ़ते है। शायद ही कोई उज्व्े कल जैसा होगा। साहेब, ऐसी उम्र में लगभग ६-७ भाषा के न्यू जपेपर रोजाना बेचता है। साथ ही कई और कार्य भी करता है। कई लोगों से बड़े मधूर सम्बदन्धऐ है उसके, और सबसे महत्वरपूर्ण बात ये है कि उसे २१०० रूपये कि गहरी समझ है। शायद ही इतनी उम्र का कोई और दूनिया मे ऐसी समझ रखे। उज्व् हल की यही अच्छा ई हमें भी प्रेरित करती है। शायद इसीलिए उसे रोजाना चाय की चुस्की। के दौरान हम कुछ दवाई व बीमारियों के बारे मे जरूर बता देते थे। जो काफी हद तक उसकी डॅाक्टारी नॉलेज के लिए पूर्ण न हो , मगर उसके लिए आवश्यरक जरूर है। एक मिडिल क्लाहस फेमिली से होने के कारण हम बंधे हुए जरूर थे।
खैर छोड़ो, आज हमारा कॉलेज का आखिरी दिन है। कल से भरतपुर पहुँच कर मुझे अपनी उस सिटी में ही ट्रेनिंग के लिए धक्केो खाने है। कोई बात नहीं मैं ये सब सह सकता हूँ। मगर ज्याुदा चिन्ता उज्व् ययल की है। उसके साथ खेलते-खालते हमने तो डिग्री पा ही ली। मगर आज भी उज्व् स ल वही चौराहे पर पड़ा है। आज अपने दिल मे मैंने भी एक दृढ़ संकल्प किया है कि एक बार कही जल्दी से सेटल हूँ। फिर उज्व्ौराल डाक्टिर जरूर बनेगा। बो भी खतरनाक बीमारी का इलाज करने वाला डॉक्टैर। लेकिन तब तक उज्व्ल्दल क्या करेगा। शायद यहाँ से किसी नयी ओर तो वह नहीं चला जायेगा या अन्यॉ बच्चों की तरह वो भी कोई दूसरा-भद्धा रास्तार अपना लेगा।
बस कुछ ही दिनों की बात है। आज उज्व् ल बनकर उज्व्ा सल की तरफ से यह संदेश लिख रहा हूँ। कल सुबह मैं यहाँ से चला जाऊगाँ। और यह संदेश हॉस्टिल वाले उस्ताजद को दे कर जाऊगाँ ताकि आने वाले किसी अन्यह आशिश को इस आशिश का संदेश मिले। और अगले ३ वर्ष तक कोई अन्या आशिश उज्व्ँ ल का दोस्तू बने। वो भी सच्चाभ दोस्त , इस आशिश जैसा, जिसके साथ उज्व्य ल चाय पिये, अपनी बातें शेयर करें। साथ ही कुछ अन्यस दवाइयों व बीमारियों पर टिप्सश लेता रहे। अच्छा् एक बात और उज्व् स ल का यह ‘साहेब’ शब्द। अपने साथ लेकर जा रहा हूँ ताकि उज्व्ियोल को भूलू नहीं। और साहेब जहाँ भी रहूँ किसी अन्या उज्व्श ल के करीब जा सकू।
हे भगवान मेरी इस दिल-ई-तमन्नास को जरूर पूरा करना। ...................आशिश

 

 

 

HTML Comment Box is loading comments...