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mar 2017
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चूड़ियाँ----डॉ मधु त्रिवेदी

 

 

चूड़ियाँ ,खूब फबती
सौंदर्य में चार चाँद लगाती
कलाई की बन हथकडी
जीवन का चक्रव्यूह बनाती
सौन्दर्य का यह उपकरण
निखारे सुन्दरता
लाल पीली हरी नीली भाती
टँगी दुकान में नजर आती
खनखन करती चूड़ियाँ

 

एक रिश्ता बनता चूडी
चूडीबाले और मेरे बीच
भावनाओं के आदानप्रदान
वेगों के विनिमय का
चूडियों को दिखलाता देता
कुछ कुछ कह भी जाता
भावभंगिमाओं की भाषा

 

चूडियों की खनखनाहट में
टूटती चूड़ियाँ भेद खोल
अन्तस भावों को गंभीर बना
भावों में व्यक्त करती
चूड़ियाँ मात्र प्रतीक
दूटे सुलगते हृदय का
फिर बाद वो खनक मौन
हमेशा के लिए हो जाती

 

तुमने भी कहा मुझसे एकबार
बिन चूडी के सुने हाथ
नही मुझे अच्छे लगते
फिर चार चूड़ियाँ
पहनायी मेरी कलाई में
बस मैं केवल तुम्हारी

 

 

 

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