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mar 2017
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भारत में नकली दवाओं का कारोबार और खतरे—एम वाई सिददीकी

 

 

लोगों की जान से खिलवाड़ करने वाली नकली दवाएं जान की रक्षा करती हैं या जान लेती हैं? हमारे देश में नकली दवाओं का कारोबार जंगल में आग की तरह फैल रहा है यह हमारे सरकारी तंत्र की विफलता का सूचक भी है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के अनुसार संसार में बनने वाली कुल दवाओं का अकेले 35 प्रतिशत भारत में निर्मित होता है जो नाइजीरिया के 23 प्रतिशत से ज्यादा है। यह धंधा देश की गरीब और अनपढ़ जनता के जीवन के साथ खिलवाड़ है जिसमें दवा निर्माता से लेकर डॉक्टर, ड्रग इंस्पेक्टर और दुकानदार तक शामिल हैं। एक्सपायर्ड दवाओं की बिक्री का ग्राफ बढ़ता जा रहा है। वर्तमान समय में देश में कुल दवा कारोबार 5000 करोड़ रूपये का है जिसमें 20 प्रतिशत भाग नकली दवाओं का है जो अभी भी बढ़ता जा रहा है। यह भयावह है। कहना नहीं होगा कि दवा कंपनियां, हॉस्पीटल आदि सब मिलकर गरीबों पर इन दवाओं के प्रयोग के लिए चार्ज देती हैं जो गरीबों के जीवन में कई दुष्प्रभाव सामने आते हैं। हॉस्पीटल्स इस मामले में अपने को टैक्स से छूट प्राप्त कर लेते हैं।

 

 

जैसा कि अक्सर देखा जाता है कि सरकार हमेशा इस मामले में अपने अलग कर लेती हैं जबकि सरकारी तंत्र के मिलीभगत के बिना यह संभव ही नहीं है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़े बता रहे हैं कि 2009 में देश में मात्र 0़0046 प्रतिशत नकली दवाएं बाजार में थीं जबकि मीडिया रिपोर्ट कहती हैं कि 25 प्रतिशत नकली दवाओं का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है। जब से लाइसेंस की बाध्यता खत्म हुई है बहुत सारी फार्मेसी कंपनियां धड़ल्ले से बिना ड्रग्स कंट्रोलर ऑफ इंडिया अथॉरिटी की इजाजत के इसका उत्पादन कर रही हैं। इस तरह के खुले वातावरण का बेजा इस्तेमाल करते हुए दवा कंपनियां नकली दवाओं के कारोबार में खुलकर काम करने लगी हैं। इसके लिए देश का सरकारी नियंत्रण तंत्र भी बराबर का दोषी है जो इसे बढ़ावा देने में उन दवा कंपनियों और अस्पतालों, मेडिसीन दुकानों से रिश्वत खाता है।

 

 

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए भारत सरकार के सूत्रों का कहना है कि सरकार ने ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट में संशोधन किया है और यह प्रभावी भी है। जिसके तहत ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट (डीसीए) में कड़े दंड, आजीवन कारावास और 10 लाख रुपये जुर्माना का प्रावधान किया गया है।

 

 

यही नहीं उठाए गए अन्य कदमों में डीसीए क्लिनिकल परीक्षण पर एक रोक लगाने के लिए एक्ट में संशोधन कर रहा है । एक व्हिसिल ब्लोअर योजना भी बनाई जा रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्य औषधि नियंत्रकों, राज्य निरीक्षणालय कर्मचारियों को निर्देश दिया है कि नकली दवाओं के निर्माण से संबंधित कार्यों के कार्यान्वयन व दिशानिर्देश का कड़ाई से पालन करें और खतरों के समाप्त होने तक समुचित निगरानी करें। केन्द्रीय औषध मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) जेनेरिक नाम से दवाओं की कम कीमत पर दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने और उसे बढ़ावा देने की कोशिश में है ।

 

 

रसायन और उर्वरक मंत्रालय ने आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची (NLEM) के अनुसार दवाओं का मूल्य निर्धारण, क्लिनिकल परीक्षण पर रोक लगाने, औषधि विभाग द्वारा दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए एक तंत्र की स्थापना किया है जो नियंत्रण प्रावधानों के दुरुपयोग को रोकने के लिए प्रभावी जांच तंत्र बनाएगा। यह कार्य दवाओं की कीमत नियंत्रण आदेश, 1995 (डीपीसीओ), और राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण से अलग कार्य करता रहेगा।

 

 

भारत सरकार भारतीय दंड संहिता की धारा 1860 में संशोधन करने जा रही है जिसके तहत नकली दवाओं के कारोबारियों की जमानत को असंज्ञेय अपराधों की सूची में डाला जा सके और उन्हें जमानत न मिल सके। इसके साथ ही जेनेरिक दवाओं के प्रयोग को बढ़ावा देना शामिल है ताकि दवाओं का मूल्य नियंत्रित किया जा सके।

 

 

सरकार ने राष्ट्रीय फार्मोकोविजिलेंस कार्यक्रम (एनपीपी) लाने की योजना बनाई है ताकि लोगों में जागरूकता लाई जा सके और दवाओं के क्लीनिकल ट्रायल्स पर रोक लगाई जा सके। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने इस तरह के विशेष न्यायालयों की स्थापना भी की है जिसमें नकली दवाओं के मामलों की ही सुनवाई होती है। प्रयास तो यह भी है कि नकली दवा कारोबार, बिक्री और प्रिस्क्रीप्शन के मामले को स्पीडी ट्रायल से दोषियों को सजा दिलाई जाए।

 

 

नकली दवाओं से लड़ाई एक लंबी लड़ाई है जिसमें ड्रग्स के अवैध कारोबार को भी खत्म करने की योजना शामिल की जा सकती है। इस कार्य को सफल बनाने में सरकारी तंत्र की इच्छाशक्ति और ईमानदारी महत्वपूर्ण है। क्योंकि लंबे समय से चल रहे अवैध और नकली दवाओं के कारोबार को फलने फूलने देने में मिलीभगत का खेल यही सरकारी तंत्र खेल रहा था? आखिर इस नकली दवा कारोबार नेक्सस को रोकने की जिम्मेदारी किसकी है? यह तथ्य समझ से परे नहीं है।

 




अंग्रेजी से अनुवाद- शशिकान्त सुशांत, पत्रकार

 

 

 

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