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स्वर्गविभा :   अन्तरजाल  पत्रिका










 

 

कन्या भ्रूणहत्या --अंजलि अग्रवाल

 

 

मुझे मत रोको,
मैं जीना चांहती हूँ,
मैं इस दुनिया में आना चांहती हूँ,
तुम्हारे ही कहने पर आयी हूँ मैं,
अब यू न मूँह मोड़ो मुझसे,
वादा है मेरा
लडका बनके में दिखलांऊगी ,
बुढापे में तुम्हारे कन्धे का सहारा मैं बन जाऊँगी ,
हर दूप ठण्ड से तुमको मैं बचाऊँँगी ,
एक बार मेरी आवाज सुनो ,
वादा है तुमसे
अपने पीछे अपने भाई को ले आऊँँगी ,
मेरे ही नाम से जाने जाओगे तुम ,
आदर सम्मान से पहचाने जाओगे तुम ,
जाते जाते भी कन्या दान का सुख दे जाऊँँगी ,
दूसरे घर जाकर मान तुम्हारा बढाऊँँगी ,
मैं तुमसे पूछती हूँ माँ ,
क्या लड़की होना गुनाह है ,
क्या तुम्हारे माँ-बाप ने तुम्हे जन्म नही दिया ,
कब से इंतजार कर रही हूँ मैं ,
जिस घर जाती हूँ पेरो से कुचला जांती हूँ मैे ,
तेरा ही हिस्सा हूँ मैं माँ , यू न काँट कर फेंक मुझे,
बिन पानी मछली की तरह तडपती हूँ मैं ,
तुम्हारे आगे भीख माँगती हूँ मैं ,
थोड़ी सी जिन्दगी दे दो मुझे , बचा लो मुझे ,
मैं जीना चांहती हूँ,
मैं इस दुनिया में आना चांहती हूँ।

 

 

 

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