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"तेरे दीदार सा दिलक़श,कोई मंज़र नहीं--संजय कुमार शर्मा 'राज़

 

 

"तेरे दीदार सा दिलक़श, कोई मंज़र नहीं मिलता,
के, पैना तेरी नज़रों सा, कोई ख़ंज़र नहीं मिलता,

 

 

गली-कूचों में चेहरे हैं हँसी बेहद मगर, जानाँ!
तेरे पैकर के मुक़ाबिल कोई पैकर नहीं मिलता,

 

 

तेरी बाँहों के घेरे में, मेरा इक घर है ख़्वाबों का,
तेरे घर जैसा हँसीं इस शहर में घर नहीं मिलता,

 

 

घुसे जो आँख के ज़रिए, चुभे सीधे ज़िगर पर वो,
सिवा तेरी नज़ाक़त के, कोई नश्तर नहीं मिलता,

 

 

ईंट-पत्थर के चमकते, इमारत संगेमरमर के,
मगर मज़बूत मेरे यार सा अक़्सर नहीं मिलता,

 

 

सुना है आशिक़ी, क़ुदरत ने तय कर दी है पहले से,
जिसे दिल चाहता है वो ही क्यूँ पल भर नहीं मिलता,

 

 

बड़ी नेमत से हासिल है मुझे दिल मेरी जानाँ का,
मिरे दिलदार जैसा इश्क़ कीमत पर नहीं मिलता,

 

 

लिखे हैं, लिखने वालों ने, लहू से हर्फ़, पत्थर पर,
यक़ीनन आशिक़ी का राज़, कागज़ पर नहीं मिलता,

 

 

ये दुनिया है तो मिल ही जाता है कोई यहाँ अक़्सर,
न जाने कोई क्यूँ तुमसे यहाँ, बेहतर नहीं मिलता,

 

 

सितम! के जब से रिश्ता तय हुआ है मेरे जानम का,
वो अहले शाम ना अहले सुबह छत पर नहीं मिलता,

 

 

हज़ारों क़ाफ़िले मुझको मिला करते हैं, राहों पे,
हो जिसमें यार की डोली वही लश्क़र नहीं मिलता,

 

 

जहाँ शीशे के घर टूटा किए हैं रोज़, ठोकर से,
वफ़ा का घर जो तोड़े 'राज़' वो पत्थर नहीं मिलता।।"

 

 

संजय कुमार शर्मा 'राज़'

 

 

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