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सुहागरात----मँजु शर्मा

 

 

लघुकथा --- सुहागरात

 


लक्ष्मी विदा हो कर ससुराल आ गयी। पूरा दिन रिवाजों और रस्मों को
निभाने में निकल गया। दोपहर के बाद से ही लक्ष्मी को पति विजय दिखायी
नहीं दिय़े थे। संकोचवश वो किसी से विजय के बारे में पूछ भी नहीं पायी थी।
रात को सुहागसेज पर पति का इन्तजार कर रही थी। आधी रात गुजर चुकी
थी। वो इंतजार करते करते ऊँघने लगी थी कि दरवाजा खोलकर उसके ससुर
आये और स्नेह से दुलारते हुए बोले -
" बेटा तू अब सोजा ,विजय के हेडऑफिस से इमरजेंसी काल आ गया था,
बार्डर पे हमला हुआ है ,तो उसे वहाँ तुरंत रिपोर्ट करने का आदेश मिला था ,
वो तुरंत ही कश्मीर के लिए निकल गया और बेटा तू रस्मों को निभाने में
बहुत सारी औरतों से घिरी बैठी थी , तुझसे मिलने का इन्तजार करता तो
गाड़ी निकल जाती ,समय बिलकुल नहीं था,इसलिए वो तुझसे बिना मिले
ही चला गया। "
" पापा जी ! इमरजेंसी काल ?" लक्ष्मी सिसक पड़ी
"हाँ बेटा ,ले ये खत विजय तुम्हारे लिए छोड़ गया है।"

 


---मँजु शर्मा

 

 

 

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