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अंक: सितम्बर २०१७

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सिलसिला------विजय कुमार सप्पत्ति  

 

 

सिलसिला कुछ इस तरह बना..........!

 

कि मैं लम्हों को ढूंढता था खुली हुई नींद के तले |
क्योंकि मुझे सपने देखना पसंद थे - जागते हुए भी ;
और चूंकि मैं उकता गया था ज़िन्दगी की हकीक़त से !
अब किताबो में लिखी हर बात तो सच नहीं होती न .
इसलिए मैं लम्हों को ढूंढता था ||

 

फिर एक दिन कायनात रुक गयी ;
दरवेश मुझे देख कर मुस्कराये
और ज़िन्दगी के एक लम्हे में तुम दिखी ;
लम्हा उस वक़्त मुझे बड़ा अपना सा लगा ,
जबकि वो था अजनबी - हमेशा की तरह ||

 

देवताओ ;
मैंने उस लम्हे को कैद किया है ..
अक्सर अपने अल्फाजो में ,
अपने नज्मो में ...
अपने ख्वाबो में ..
अपने आप में ....||

 

एक ज़माना सा गुजर गया है ;
कि अब सिर्फ तुम हो और वो लम्हा है ||

 

ये अलग बात है कि तुम हकीक़त में कहीं भी नहीं हो .
बस एक ख्याल का साया बन कर जी रही हो मेरे संग .
हाँ , ये जरुर सोचता हूँ कि तुम ज़िन्दगी की धडकनों में होती
तो ये ज़िन्दगी कुछ जुदा सी जरुर होती……||

 

पर उस ज़िन्दगी का उम्र से क्या रिश्ता .
जिस लम्हे में तुम थी, उसी में ज़िन्दगी बसर हो गयी .

 

और ये सिलसिला अब तलक जारी है …….|||
© विजय

 

 

 

 

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