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अंक: सितम्बर २०१७


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शिक्षा एवं शिक्षण संस्थाओं की समस्या -----डा प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

 

 

माँ सरस्वती की कृपा पर निर्भर लक्ष्मी आराधक शिक्षित वर्ग अपने नन्हें –मुन्नो के भविष्य के लिए सदा चिंतित रहता है । सामाजिक स्पर्धा एवं वर्ग भेद उन्हें चैन की सांस नहीं लेने देता है ।आत्मनिर्भरता प्राप्त करने हेतु आर्थिक स्थिति मेन सुधार व उन्नति का सपना हर मध्यम वर्गीय समाज के व्यक्तियों का सपना है , जिसे यथार्थ मेन तब्दील करने की हरेक व्यक्ति पुरजोर कोशिश करता है “अर्थ व्यवस्था के सुधार मे लगा हर व्यक्ति साथ मे अपने शिशुओ के भविष्य का बोझ भी समेट कर जी रहा है “। बेहतर जमाने मे सांस लेने वाले प्रत्येक शिशु का जन्म सिद्ध अधिकार है कि वह अपने रुचि व बोद्धिक स्तर के अनुसार उत्तम शिक्षा ग्रहण करे । “अपने माता पिता के जीवन स्तर में सुधार लाये व उन कमियों को दूर करे जो जीवन में बाधा बन कर खड़ी थी या प्रगति मे बाधक थी । “
हर माता –पिता शिशु के जन्म से एक सुनहरा स्वप्न देखताहै कि मेरे शिशु के जीवन में वो कमियाँ या अभाव जो जीवन भर हमारे साथ थी , उन्हें दूर कर उनके सुनहरे भविष्य का मार्ग प्रशस्त करेंगे । इसके लिए वो बेहतर शिक्षा व जीवन स्तर के लिए अपने बच्चो को बेहतर निजी शिक्षालयों मे प्रवेश कराता है । ।एवं शिशुओ कि गतिविधियो से आनंदित होते हैं ।
हमारे शिक्षा का स्तर केवल स्कूल –कॉलेज या महाविधालय बनाने से पूर्ण नहीं होता है । विध्यालय न केवल विध्यार्थियों की उपस्थिती से बनते है बल्कि शिक्षक एवं शिक्षण सामाग्री से बनते हैं ।
एक जिज्ञासु विध्यार्थी अपनी ग्यान पिपासा सीमित साधनो से नहीं बुझा सकता है । उसे अच्छे ग्यान वर्धक पुस्तकों की अवश्यकता होती है । अच्छे शिक्षक जो निरंतर अध्ययनरत व चिन्तन कर शिशुओ के संदेह का निवारण कर सके , एवं दिन –प्रतिदिन शोध कर सके , की आवश्यकता है ऐसे शिक्षक जो ईर्ष्या –द्वेष , वर्ग –भेद , जाति भेद से ऊपर उठ कर सच्चे जिज्ञासु विध्यार्थी का चयन कर सके एवं उनका मार्ग –दर्शन कर सके । ऐसे शिक्षक वास्तव में अपने विध्यार्थियों के लिए कालजयी पथप्रदर्शक होते हैं , उन्हे समूचा विध्यालय हर समय याद करता है ।
विध्यालयों के निर्माण एवं विध्यार्थियो की गुणवत्ता आधारित प्रवेश प्रक्रिया से शिक्षा के स्तर में सुधार नहीं हो सकता है । शिक्षकों के गिरते स्तर व तकनीकी परक शिक्षा का अभाव , गिरते आर्थिक स्तर के चलते विध्यार्थियो को रोजगार की तलाश में अपना भविष्य गवाते सभी ने देखा है , शिक्षा का अर्थ शैक्षिक योग्यता का अहंकार पालना नहीं होता है , बल्कि शिक्षा का अर्थ रोजगार –परक व जीवनोपयोगी होता है ।
व्यक्ति समय का सदुपयोग करते हुए जीवन के मूल्यों को स्वीकार करे । और विवेक का प्रयोग एसएचयूबीएच –अशुभ , हानि –लाभ , अर्थ –अनर्थ की पहचान करने मे करे । जो सत्य सर्व स्वीकार्य हो उसका उपभोग करे ।
जीवन मे प्रत्येक रस , प्रत्येक विधा का महत्व पूर्ण स्थान है । विधाओ की भिन्नता एक दूसरे की पूरक है , प्रतिस्पर्धी नहीं । जीवन के प्रत्येक क्षण मे हर विधा अपनी भूमिका बखूबी निभाती है । सामाजिक सामंजस्य व आपसी सौहार्द्य इन विधाओ की खूबसूरती है । जीवन जीने की कला है । हर विधा का आनंद लेना चाहिए।
आज हम शिक्षा के लिए इन्फ्रा स्ट्रक्चर पर ज़ोर दे रहे हैं , परंतु विध्यार्थियो के लिए सम्पर्क मार्ग , शोचलाय ,बेंच टेबल , पंखे बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओ का अभाव है । स्वाध्याय हेतु पुस्तकालयो एवं वाचनालयों मे ग्यान वर्धकविषय से संबन्धित पुस्तकों का अभाव है । रात्री मे असुरक्षा की भावना बिजली का अभाव , हमारे जीवन के सुनहरे पलों को भयावह बनादेता है । विध्यार्थी जीवन कुंठित हो , भ्रमित हो अपूर्ण शिक्षा के कारण निरर्थक जीवन साबित होता है
आज अवश्यकता है बचपन से शिशु की मेधा शक्ति व रुचि पहचान कर शिक्षित करने की , जिससे इन कर्णधारों को सुसंस्कारी , सचरित्रवान , शोधपरक बनाया जा सके ।

 

डा प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

 

 

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