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अंक: सितम्बर २०१७

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नागार्जुन के काव्य में समाज चित्रण एवं शिक्षा ----डाॅ. मधु पाराशर

 

 

शान्ति निकेतन काॅलिज आॅफ बिजिनिस मैनेजमेंण्ट
एण्ड कम्प्यूटर साइंस, तेहरा, आगरा
प्रस्तुत शोधपत्र नागार्जुन की वर्तमान सामाजिक व्यवस्था पर व्यंग्यात्मक दृष्टि के साथ काव्य सृजन के माध्यम से प्रदर्शित उनके शैक्षिक विचारों को प्रस्तुत करता है।
नागार्जुन समाजवादी अर्थ व्यवस्था के समर्थक तथा राष्ट्रीय भावना के पोषक हैं। मानव मूल्यों की स्थापना हेतु संघर्षरत हैं। सृष्टि का केन्द्र मानव हैं। समाज का मृूल यदि मानव नहीं है, तो धरती की शोभा तथा प्राकृतिक सुषमा व्यर्थ है। दूसरों के दुःख दर्द में जो काम नहीं आया, उसका जीवन निस्सार है। नागार्जुन ने मानवीय संवेदनाओं से प्रेरित प्रगतिशील साहित्य की रचना की है तथा समस्त विकृतियों के चिन्तन के माध्यम से उदात्त जीवन मूल्यों की अभिव्यंजना की है। एक ओर ब्रिट्रिश दासता के उस युग में जमींदारी और शोषण, सरकारी कर्मचारियों के अत्याचार एवं रिश्वतखोरी, बेकारी की समस्या, सरकारी दमन चक्र की कुटिल नीतियाँ, सामाजिक रूढ़िवाद, साम्प्रदायिकता, जातीयता और पूँजीवाद जैसे महत्व के विषय उनकी लेखनी के माध्यम से मुखरित हुए हैं तो दूसरी ओर भारतीय जनता की परिसीम उमंग से भरी सर्वस्व बलिदान कर देने वाली अदम्य भावना भी उनके चित्रण का विषय है।
विनोदी स्वभाव, फक्काड़ना अन्दाज, सस्ता खादी का कुर्ता-पायजामा, सामान्य कद, आँखों पर चश्मा, कबीर की भाँति मस्तमौला, स्वतः के प्रति लापरवाह किन्तु समाज के लिए जागरुक, शोषित असहाय जनता के प्रति संवेदनशील व्यक्तित्व का नाम है नागार्जुन। कवि अपनी कविता में किसी भी पक्ष को ”दो टूक कहता है“ क्योंकि कहने में मुश्किल तो उसे होती है जिसमें खोट होता है।
साहित्य को जनगण की आकांक्षाओं का प्रतिबिम्ब होना चाहिए। इस मान्यता को सामने रखकर नागार्जुन ने अपनी कृतियों में सर्वहारा वर्ग का स्थान देते हुए उसकी प्रत्येक गतिपूर्ण तथा गतिहीन चेष्टा को प्रस्तुत किया। नागार्जुन काव्य यात्रा के अनेक पड़ाव हैं, अनेक धरातल तथा अनेक मोड़ हैं। नागार्जुन की कविताऐं वैसे तो सन् 1934 के आस-पास शुरु होती है, किन्तु पुस्तक के रूप में प्रथम संकलन ”युगधारा“ 1953 में प्रकाशित हुआ। प्यासी पथराई आँखें, सतरंगे पंखो वाली, खिचड़ी विप्लव देखा हमने, तुमने कहा था, हजार-हजार बालों वाली, पुरानी जूतियों का कोरस, आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने, रत्नगर्मा, भस्मांकुर, नागार्जुन के काव्य संगृह हैं।
समाज चित्रणः-
सामाजिक यथार्थ से रहित साहित्य का कोई मूल्य नही होता है। जो साहित्य जीवन के उतार-चढ़ाव से रहित होता है। वह प्रगतिशील साहित्य नहीं हो सकता। इसकी अन्र्तभूत मान्यता है कि मानव सभ्यता की सम्पूर्ण प्रगति मनुष्य की अपनी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रगति की देन है। प्रेमचन्द्र ने सामाजिक यथार्थ को जिस प्रगतिशील परम्परा की नींव रखी थी उस परम्परा की अगली सशक्त कड़ी क्रान्ति दूत नागार्जुन है।
भारत कृषि प्रधान देश है जिसकी अस्सी प्रतिशत जनसंख्या गाँव में रहती है। पहले गाँव वस्तु विनिमय के आधार पर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर लेते थे। कला-कौशल एवं कुटीर उधोगों के द्वारा इन्हें स्वावलम्बन प्राप्त था जो वैज्ञानिक उन्नति एवं अंग्रेजों की ”फूट डालो और राज्य करो“ नीति के कारण समाप्त हो गया। धनी गरीब का अन्तर बढ़ता चला गया। कवि ने देखा धर्म के नाम पर अनेक कुरीतियां, अंधविश्वास, पुरोहितवाद और कर्मकाण्ड तथा अशिक्षा समाज में व्याप्त है।
प्रगतिशील साहित्य जनता के हित की तरफदारी करता है अतः देश की प्रगति विरोधी अवस्था से उसके तटस्थ रहने की कल्पना नही की जा सकती है। नागार्जुन सामान्य जन के बीच पैदा हुए थे अतः जन का क्रोध, दुःख-सुख, जीवन का संघर्ष उनमें विद्यमान है। इसी कारण ‘जन वन्दना’ शीर्षक कविता में कवि मनुष्य की वन्दना करना ईश्वर की वन्दना से श्रेयस्कर समझता है। नागार्जुन का यह मानववाद एक तरफ वैज्ञानिक चिन्तन की ओर अभिमुख है, जो दूसरी तरफ आज के समाज के अन्तर्विरोधों के खिलाफ एक सजग रचनाकार की तीव्र प्रक्रिया से सम्बद्ध है। जनजीवन से अविच्छेद सम्बन्ध और उसके सांस्कृतिक परम्परा के विपुल ज्ञान का परिणाम हुआ कि नागार्जुन की कविता में सांस्कृतिक गरिमा आयी है।
नागार्जुन ने किसान की कसक एवं पीड़ा का जो चित्र उकेरा है वह वर्तमान में सारी अर्थ व्यवस्था को नंगा कर देता है। भयानक अज्ञानता के कारण चालाकी की पहचान यह वर्ग नहीं कर पाता है। किसान की पत्नी बीमार है फिर भी चक्की पीस रही है मानो अपनी जिन्दगी की चक्की चला रही हो। फिर भी उसे नमक रोटी नसीब नहीं होती है-
कैसा सूख टिक्कड़ तोड़, हाय नमक तक नहीं मिलता।
दिलबा दो दबा कहीं से बच्ची है बीमार जी।
(भाई भलें मुरार जी)
नागरिक की शिक्षा कैसे होती है। ‘प्रेत का बयान’ कविता में प्राइमरी स्कूल के अध्यापक की दारुण दशा का चित्रण है। गांव में आज भी अछूतों को मन्दिरों में जाने का हक नहीं है। गांव के बाहर उनकी बस्ती है, पानी पीने का कुंआ है। नागार्जुन की दृष्टि इन अत्याचारों को देखकर चुप नहीं रह पाती है-
दूर होगा ब्राह्मण का दम्भ
शान्त हो जायेगा राजन्य
वैश्य का लालच होगा नष्ट
शूद्र होगा उन्नत स्वाधीन।
गाँवों की झोपड़ी में कवि दृष्टि ‘नयी पौंध’ कविता में पहुंचती है। कवि मन झोपड़ियों में रहने को विवष हो जाता है वह सफेद पोशी को नहीं छोड़ सकता है। श्रमिक, मजदूर की श्रेणी में अपने को नहीं रख सकता है।2
गांव बाढ़ में बर्बाद हो रहा है किन्तु प्राचार्य का दर्शन उनकी कटी उंगली पर नमक का काम करने वाला है। प्राचार्य का संकट इन सबसे अलग है-
डालर की किल्लत खूब रही लल्ला नही जा सके शिकागो
...........कुर्सीधर प्राचार्य बोले हो गयी
गरीब की कैरियर चैपट।
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कुर्सीधारी प्राचार्य की संवेदना गांव की बर्बादी से नहीं जुड़ती वरन् अपने बेटे का भविष्य अन्धकार में पड़ा दिखायी दे रहा है। कवि मन इसी अज्ञानता को शिक्षा के माध्यम से दूर कर सबको सुखी देखना चाहता है। नागार्जुन की यह यथार्थवादी चेतना ग्रामीण जनता के साथ किस हद तक घनिष्ठता से आबद्ध है इसे मुक्ति संघर्ष नामक कविता में देखा जा सकता है-
श्रमिक वर्ग की नव संस्कृति ही थी बस तुमको प्यारी
प्रलोभनांे को अन्तिम क्षण तक तुमने ठोकर मारी।
(मुक्ति संघर्ष, 29 नवम्बर, 1981)
कवि को पूर्ण विश्वास है कि कृषकों पर जमीदारों द्वारा जो अत्याचार अभी तक हुए हैं अब समाप्त हो जायेंगे। समय परिवर्तित हो चुका है। नौकरशाही और जमीदारी समाप्त हो चुकी है।3
नागार्जुन के समकालीन समाज के समान वर्तमान समाज भी विषमताओं के अम्बारों से आछन्न है इसका एक अंग शील संकोच को त्याग कर दाँत दिखाता है। दूसरी ओर लोग दुःखी हैं। मुट्ठी भर लोग सुखी हैं किन्तु जो लोग दुःखी हैं उनकी चिन्ता किसी को नहीं है। सरकार भी इन चन्द लोगों की सुख समृद्धि में देश का विकास मान लेती है, नेताओं के नारे और सरकारी घोषणाऐं मात्र जालसाजी के इज़हार है देेश की स्थिति का चित्रण देखिए-
माताओं पर, बहनों पर घोड़े दौड़ाये जाते हैं
मारपीट है लूटपाट है, तहस नहस बरबादी है।
(युगधारा)
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नागार्जुन की ये पंक्तियां प्रेमचन्द्र के गोदान की सामाजिक संरचना को प्रस्तुत करती है। सामन्तशाही वर्णव्यवस्था वर्तमान पूँजीवादी शक्तियां साम्राज्यवाद की छाया में पलती है, जो शोषकों की रक्तलालसा से जीभ लपलपाती हुई चारों ओर नजर आती है। शोषकों की दयनीयता के लिए जो उत्तरदायी शक्तियां हैं, उनके प्रति कवि में क्रोध है, आक्रोश है और नफरत है। कवि उन परिस्थितियों के लिए संघर्ष करता है जिसमें मानव व्यक्तित्व अपनी सहजता में सम्पूर्ण रूप से विकसित हो सकें। यही संघर्षशीलता नागार्जुन जगाना चाहते हैं। ‘मन करता है’ कविता में प्रतीकों के माध्यम से कवि शोषकों को नंगा करके समुद्र के किनारे रेत में दफना देने की बात करता है क्योंकि इस कमीनी व्यवस्था ने लकड़ी भी मँहगी कर रखी है। गाँधीजी ने देश में रामराज्य लाने का जो स्वप्न देखा था, उसमें रावण राज्य स्थापित हो चुका है। ऐसी दशा में साधारण जनता की दशा में सुधार कैसे होगा।4
जनकवि का यह दायित्व नागार्जुन आधोपान्त निबाहते आए हैं। उन्हें जीवन की असंगतियों और अन्र्तविरोधों से व्यंग्य मिला था। चूँकि इस परिस्थिति से टक्कर लेने वाली प्रतिरोध और नवनिर्माण की शक्तियां बिखरी हुई हैं, इसलिए उनका व्यंग्य उत्तरोत्तर सघन हुआ है। इससे पता लगता है कि ‘यात्री’ नागार्जुन अपनी तमाम यायावरी के बावजूद अपने पाठकवर्ग से असम्बद्ध न होकर संवेदनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है। शासक वर्ग के किसी भी प्रहार, प्रलोभन ने उन्हें विचलित नहीं किया क्योंकि शासक वर्ग की असलियत नागार्जुन के सामने जाहिर हो चुकी है। उनका समस्त साहत्यि इस बात को स्पष्ट कर देता है कि वह शोषित वर्ग के पक्षधर हैं तथा शोषक वर्ग के विरोधी।5
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इस प्रकार नागार्जुन का साहित्य वर्तमान समय की वास्तविकता को सम्पूर्णता के साथ चित्रित करता है और वर्तमान की मूल समस्याओं को छूता है एवं उनकी आलोचना करता है। सामाजिक प्रभाव और परिवर्तन का हथियार है। यद्यपि शोषण आज भी है किन्तु उसका स्वरूप बदल गया है। शोषण के यन्त्र बदल गये हैं। नागार्जुन अपनी कविता के माध्यम से उत्पीड़ितों का पक्ष लेते हुए एक नवीन क्रांति की पहल करते हैं, जो उत्पीड़ियों की शिक्षा से सम्बन्धित है। नागार्जुन का शिक्षा सिद्धान्त शोषित वर्ग को आवाज देकर उसे मौन रहने की संस्कृति से बाहर निकलने की प्रेरणा देता है। अतः बहुजन हिताय वाली जनवादी शिक्षा को शोषण के विरुद्ध अपनाना होगा।6
सन्दर्भ ग्रन्थः-
1. गुप्ता, डाॅ. प्रकाशचन्द - हिन्दी साहित्य की जनवादी परम्परा, पृ. 5
2. कुमार, डाॅ. रतन - नागार्जुन की काव्य यात्रा एक विश्लेषण, पृ. 44, 67
3. मिश्रा, डाॅ. शिवकुमार - नया हिन्दी काव्य, पृ. 61
4. सिंह डाॅ. नामवर - आधुनिक हिन्दी साहित्य की प्रवृतियां, पृ. 41
5. सिंह डाॅ. नामवर - ‘भूमिका’ नागार्जुन की प्रतिनिधि कविताऐं, पृ. 57
6. शर्मा डाॅ. रामविलास - प्रगतिशील साहित्य की समस्याऐं, पृ. 121, 122

 

 

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