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अंक: सितम्बर २०१७


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कैसे गाऊँ और गवाऊँ रे--- गोवर्धन यादव

 

तुम कहते हो गीत सुनाओ
तो, कैसे गाऊँ और गवाऊँ रे
मेरे हिरदा पीर जगी है
तो, कैसे गाऊँ और गवाऊँ रे
आशाऒं की पी-पीकर खाली प्याली
मैं बूंद-बूंद को तरसा हूँ
उम्मीदॊं का सेहरा बांधे
मैं द्वार-द्वार भटका हूँ

 

तुम कहते हो राह बताऊँ
तो कैसे राह बताऊँ रे
मन एक व्यथा जागी है
कैसे हमराही बन जाऊँ रे

 

रंगो-रंग में रंगी निय़ति नटी
क्या-क्या दृ‍ष्य दिखाती है
पातों की हर थिरकन पर
मदमाती-मस्ताती है

 

तुम कहते हो रास रचाऊँ
तो,कैसे नाचूँ और नचाऊँ रे
मन मयूर विरहा रंजित है
कैसे नाचूं और नचाऊं रे
दिन दूनी सांस बांटता
सपन रात दे आया हूँ
मन में थोडी आंस बची है
तन में थोडी सांस बची है
तिस पर तुमने सुरभि मांगी
तो,कैसे-कैसे मैं बिखराऊँ रे
तुम कहते हो गीत सुनाऊँ
तो कैसे गाऊँ और गवाऊँ रे

 

 

 

 

 

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