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अंक: सितम्बर २०१७ 

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विश्व पटलपर हिंदी साहित्य----सुखमंगल सिंह

 

 

हिंदी साहित्य के व्यापक इतिहासों में विशेष कर हिंदी साहित्य का इतिहास आचार्य रामचंद्र शुक्ल,हिंदी साहित्य का बृहद इतिहास सोलह भाग,मिश्रबंधु विनोद,हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास जैसे ग्रंथों में मान्यता प्राप्त कर सके। खोज रिपोर्टों के अध्ययन से अतुल साहित्य हिंदी जगत् के सम्मुख उपस्थित हुआ और इसका कुछ उपयोग भी हुआ। खोज की दिशा में बढ़ते कदम के साथ प्राचीन साहित्य के संरક્ષण एवं आकलन के लिये वैજ્ઞાनिक दृष्टि से नागरीप्रचारिणी सभा ने हिंदी में हस्तलेखों की खोज की। जो कि प्रारंभिक पचपन वर्षों की खोज में छ:हजार पांच सौ नब्बे ग्रंथकारों व पन्द्रह हजार आठ सौ बयासी ग्रंथों के विवरण सभा ने इकट्ठा किए।1।

कोई भी देश हो सभ्यता और संस्कृति को अपने आप में सजोकर समाज को नव दिशा निर्देशन में सहयोग प्रदान करता है।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विश्व इतिहास की झलक में लिखा है कि'भारत में संस्कृति के दिवालियापन का सबब हमारे देशवासियों की घोर गरीबी है। जिन लोगों के पास खाने को भी नहीं है,उनसे संस्कृति की बातें करना उनका अपमान करना है।गरीबी की यह मार उन गिने चुने लोगों पर भी पड़ी है,जो संयोग से दूसरोंसे ज्यादा मासूदा हैं।'।2।

भारत उन दिनों गुलाम था भारत पर अंग्रेजी शासन था, नेहरू जी ने आगे लिखा है कि विदेशी राज और समाजी गिरावट
से कैसी बेशुमार बुराइयाँ पैदा हो जाती हैं पर इस आम गरीबी बेरंगी में भी भारत गाँधी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसी विभूतियाँ और संस्कृति के शानदार आदर्श पैदा कर सकता है।3।

हिंदी साहित्य हो वा अन्य भाषा साहित्य, इतिहासऔर परम्परा से इतर कोई भी नया रूपवान होते हुए भी जो भड़कीला,चकाचौध लुभावना तात्विक नहीं हो सकता तथा तत्व हीन जीवन दायनी नही हो सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि क्या नया इतिहास की गति से अलग अपने स्तित्व को साबित कर सकता है?इतिहास जीवन की गतिमान विकासमान अनुभवराशि-भावराशिएवं જ્ઞાनराशि से पृथक निरपेક્ષ आत्म भावनात्मकता का निरूपण हो सकता है?14।

शब्द-शब्द जीवन की प्रतिबिम्वनात्मकता संकेत है।
भाषा-भाषा जीवन की गति का प्रतिबिम्वनात्मक सम्प्रेष्य- सम्प्रेषणा का सार्थक ध्वनि रूप ध्वनि बेध होती है।
शब्द और भाषा-शब्द और भाषा के जैविक स्वरूप का विच्छेद करने वाले लोग,जीवन को लोक बद्ध शक्तियों को,बोलियों को,
सहज सामोहिकता को काट डालते हैं। इस पर चिंता ब्यक्त होना चाहिए कारण वह तो मूल प्रवृत्यात्मक के जटिल,शूક્ષ્म परिदृश्यका उसके रूप गठन का माध्यम है। भाषा प्रकृया बद्ध होती है।

भाषा के तत्व रूप भी होते हैं-कुछ विद्वान भाषा को मनोभाषकी के उस अंतिम छोर तक ले जाने का प्रयत्न करते हैंं जहाँ वह अंतगति और मूल प्रवृत्ति तक सिकुड़ जाती है।वे नई आनुवंशिकी में अमूर्त के संજ્ઞાन की अवहेलना करते हैं। वह विજ્ઞાन के साथ दर्शन के व्यावहारिक सम्बन्धों को भी नकारते हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि शब्द और भाषा का सोचना मानवीकी के समस्त जटिल व्यवहार की समस्त अनुभव राशि पर सोचने के बराबर भी कहा जा सकता है।5।

यदि हम हिंदी की बात करें तो मुझे अपना बचपन याद आने लगता है। उन दिनों अग्रेजी हायर सेकेन्डरी कालेज में वैकल्पिक विषय के रूप में लेना पड़ता रहा। हमें अंग्रेजी समझ में कम आती थी, पिता जी से कहा, अग्रेजी यदि नहीं पढ़ेंगे तो विदेश कैसे जा सकेगे?आदरणीय पिताजी ने बताया कि विदेश में भी हिंदी जानने वाले,पढ़ने वाले हैं। खैर विषयांतर न हों-

हिंदी धीरे-धीरे ग्लोबल होती जा रही है। विदेशियों द्वारा सम्मान के साथ चाव के साथ हिंदी सीखने की ललक बढ़ी है। सीख भी रहे हैं। हिंदी के बदले स्वरूप का जायजा लेते हुए लेखकद्वय ने लिखा है कि कोई इंडिया में कोई अपनी फैमली(परिवार)की खुशी के लिए हिंदी लिख-पढ़ रहा है तो कोई-कोई सिर्फ हिंदुस्तान को पास से जानने के लिए। उन्होने आगे लिखा है कि आज हिंदी दिवस के मौके पर विदेशियों के हिंदी प्रेम और हिंदी के बदलते स्वरूप का जायजा ले रहे हैं।6।

नेहरू जी ने आगे लिखा कि अक्सर कला और साहित्य से किसी राष्ट्र की आत्मा का जितना गहरा परिचय मिलता है,उतना
जन-समूह की ऊफरी हलचलों से नहीं। ये हमको शान्त और गम्भीर विचारों के राज में पहुचा देते हैं। जिसपर आज के दिमागी फितूरों व हठों का असर नहीं पड़ता। मगर आज कवि और कलाकार को कल का संदेश देने वाले बहुत कम समझा जाता है और उन्हें कोई सम्मान नहीं दिया जाता। आगे लिखा है कि अगर उन्हें कुछ सम्मान मिलता भी है,तो आम तौर पर मरने के बाद- मिलता है।7।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के विकास में प्रवासी भारतीयों की विशेष भूमिका रही है। वे भारत के बाहर भारत की भाषा-संस्कृति को जीवंत किए हुए हैं। अप्रवासी भारतवंशी विहार,पूर्वी उत्तर प्रदेश से खेती के श्रमिकों के रूप में माँरीशस,त्रिनडाड,दક્ષિण अफ्रीका, गुयाना,सूरीनाम तथा फिजी में गए। इन अप्रवासी भारतीयों को संस्कृति और अस्मिता की पहचान के रूप में भोजपुरी और अवधी के मिश्रित रूप वाली हिंदी ही आधार बनी रही। वह फिजी में'फिजी हिंदी'सूरीनाम में 'सरनामी'दક્ષિण अफ्रीका में 'नेताली'और वह उज्बेकिस्तान और कजाकिस्तान में 'पार्या'कहलाई। हिंदी के अध्ययन में विदेशी विद्वानों ने भी गम्भीर रुचि दिखाई है। कहागया-हिंदी का प्रथम इतिहास एक फ्रांसीसी ने लिखा। भारतीय भाषाओं का सर्वेક્ષण अंग्रेज जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन द्वारा किया गया और प्रथम शोध प्रबंध अंग्रेज जेआर कारपेंटर ने तुलसीदास पर किया।8।

वीसवीं शती के अंतिम दो दशकों में हिन्दी का विकाश विश्व में अधिक हुआ। बहुत तेजी से विकसित हुई हिंदी। सिनेमा,संगीत, विજ્ઞાपन,वेब के ક્ષેत्र में जितनी माँग हिंदी की बढ़ी अन्य किसी भी भाषा की उतनी माँग नहीं बढ़ी। यह रिपोर्ट यूनेस्को प्श्नावली पर आधारित है। जिसे हिंदी विकिपीडिया ओआरजी पर पढ़ा जा सकता है।9।

विदेशियों ने सृजनात्मक साहित्य भी रचा है। विदेश में पत्र-पत्रिकाओं का भी प्रकाशन हो रहा है। माँरीशस का'बसंत' इंगलैंड की 'पुरवाई' अमेरिका का'सौरभ' और'विश्वविवेक' तथा नार्वे का 'शांतिदूत'प्रमुख प्रकाशन है। यही नहीं प्रवासी भारतीयों द्वारा महत्वपूर्ण लेखन हो रहा है। अनेक भाषाओं के द्विभाषी शब्दकोश भी तैयार हुए हैं। वे हिंदी को भारतीय अस्मिता का प्रतीक मानते हैं। अनेक रचनाओं का विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। कप्यूटर और इंटरनेट के चलते हिंदी की वैश्विक धरातल पर उपस्थिति हो रही है। जैसा गूगल की पहल से स्पष्ट होता है। अखबारों के ई- संस्करण भी हो रहे हैं। आज हिंदी थाईलैंड, संयुक्त राज्य अमेरिका,तथा इंगलैंड आदि अनेक देशों में भी प्रयुक्त है।10।

उधर भारत के प्रधान मंत्री युग पुरुष माननीय नरेन्द्र मोदी 12वें आसियान-भारत शिखर सम्मेलन को हिंदी में सम्बोधित करते हुए कहा कि इसका हिस्सा बनना उनके लिए खुशी की बात है!उन्होंने कहा कि भारत-आसियान संबंधों में कोई कटुता नहीं है। इसलिए हमारे लिए सहयोग की संभावनाएँ अपार हैं।11।

इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने दક્ષિण पूर्वी एशिया के 10 देशों के संगठन आसियान को भारत की नई आर्थिक
यात्रा का हमसफर बनने का न्योता दिया। उन्होंने हिंदी में बोलते हुए कहा कि भारत में एक नई आर्थिक यात्रा पर निकल चुका हूँ इस नये माहौल में हम आपको आमंत्रित करते हैं। मोदी जी नें म्यामार की विपક્ષ की नेता'आंग सान सू की'से वुद्धवार12/11/2014 को मुलाकात की। उनकी लोक तन्त्र समर्थक नेता सू की से यह पहली मुलाकात थी। मोदी जी ने सैन्य शासन की गिरफ्त वाले म्यामार मेरं लोकतंत्र स्थापित करने के अथाह प्रयासों के लिए'सू की' को "लोकतंत्र का प्रतीक" बताया। वहीं सू की ने कहा कि भारत उनके लिए'दूसरा घर'है। सू की को भग्वद्गीता पर महात्मा गाँधी द्वारा लिखी किताब भी मोदी जी ने भेट की।12।

नेहरू जी की आत्मा नाराज न हो जाय इसलिए,देखें जो वे आगे लिखे हैं कि 1फरवरी,1933 के पत्र में इस लिए तुम्हें सिर्फ
थोड़े से नाम बताआऊँगा। यह सिर्फ तुम्हारी भूख जगाने के लिए है उन्होंने लिखा कि यूरोप के कई देशों के साहित्यों में उन्नीसवीं सदी की उम्दा रचनाओं के भण्डार भरे हुए हैं।13।

आज साहित्यकारों के साथ-साथ जगत का बुद्धिजीवी वर्ग भी सोशल साइट,नेट पर कार्य करने में दुनियां से जुड़ता जा रहा है, साइबर वुकिंग(नेट पर होने वाले नकारात्मक व्यवहार तो नहीं)मनोवैજ્ઞાनिक भी ऐसा मानते हैं किो कोई भी बच्चा जितना अधिक सोशल साइट से जुड़ता जाता है वह वास्तविक दुनिया से उतना ही दूर होता जाता है। उसके उन साइटों पर सैकड़ों दोस्त बनते जाते हैं।14।

साइबर बुकिंग के दुस्प्रभाव से बचें तो नेट के साइटों पर वर्तमान समय में पर्याप्त જ્ઞાनवर्धक साहित्यिक सामग्रियाँ उपलव्ध व सुलभ हैं। विश्व कवियों की यदि हम बात करें तो बायरन ने भी आजादी की स्तुति में सुन्दर कविताएँ लिखी है। मगर यह आजादी राष्ट्रीय है,आर्थिक नहीं है। जिसका जिक्र शेली की कविता में है। बारन-शेली के दो साल बाद तुर्की के खिलाफ यूनान की स्वतन्त्रता के राष्ट्रीय युद्ध में मारा गया। बारन के चरित्र के बारे में नेहरू जी खुस न थे। मगर उनकी सहानुभूति थी तो मात्र अपने पढ़े कालेज हैरो स्कूल और केम्ब्रिज के ट्रिनिटी कालेज में वह पढ़ा था।पं0 जी लिखे हैं कि कीट्स और शेली को मात देकर जवानी में ही बायरन नामवरी हासिल कर ली थी जिससे लन्दन के समाज ने उसे सिर पर बिठाया।15। अंग्रेजी के महाकवियों मे बायरन गिना जाता था उसे प्रकृति से बड़ा प्रेम था और उसका ज्यादातर काव्य निसर्ग-काव्य है। कवि कोलरिज की भी कविताओं को नेहरू जी ने प्रसन्सा की है।16।

साहित्यकार हों अथवा वैજ્ઞાनिक दोनो ही,कुछ एक अपवाद को छोड़कर दार्शनिक भी होते हैं। हम यहाँ कुछ एसे ही वैજ્ઞાनिक को बताना समीचीन समझता हूँ जिन्होंने दुनिया को उनके सिद्धान्तों को जानने-मानने-सीखने,डगर पर चलकर अमल करने के नजरिया बदल दिया। हाँ यूरोप में असली वैજ્ઞાनिक,जिसका समय 1642 से 1727ई0 तक का है के तरीकों का धीरे-धीरे विकाश हुआ और विજ્ઞાन के इतिहास में सबसे बड़े गिने जाने वाले व्यक्तियों में आइजक न्यूटन नामक एक अंग्रेज भी रहा है। न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण नियम की व्याख्या की,यानी वह बताया कि चीजें क्यों गिरती हैं!इसकी मदद से और जो दूसरे नियम खोजे जा चुके थे,उसकी मदद न्यूटन ने सूर्य और ग्रहों की चालों का भेद समझाया। छोटी-बड़ी सभी चीजों का उसके सिद्धान्तों से मेल बैठता हुआ दिखाई देने लगा और उसे बहुत सम्मान मिला।17।

यह भी सत्य है कि दार्शनिकों की सारी की सारी बातें हमेंसा सत्य हों यह सम्भव नहीं, उदाहरण स्वरूप यूरोप की जल्दी आने- वाली क्रान्ति के बारे में मार्क्स की भविष्यवाणी ठीक नही निकली उनके लिखने के साठ साल बाद और एक महायुद्ध के बाद,कहीं जाकर यूरोप के एक हिस्से में क्रान्ति हुई। जो पेरिस कम्यून के रूप में 1871ई0 में क्रान्ति की जो कोशिश हुई वह बड़ी वेदर्दी से कुचल दी गई थी।18।

फरवरी03/1933 का नेहरू जी के पत्र से इंगलैण्ड में एक पुष्तक प्रकाशित हुई जिसने कट्टरपन और वैજ્ઞાनिक नजरिये की
टक्कर को आखिरी दर्जे पर पहुचा दिया। यह पुष्तक चार्लस डार्विन की'ओरिजन आँफ स्पीसीज'(जातियों का उद्भव)थी। जो कि उन्नीसवीं सदी के बीच 1859ई0 की रही। डार्विन की गिनती बहुत बड़े विજ્ઞાनियों में नहीं है,यद्यपि बहुत से वैજ્ઞાनिक हुए फिरभी डार्विन का ग्रन्थ एक नया युग लाने वाला था। इसका जबर्दस्त असर पड़ा और किसी दूसरी वैજ્ઞાनिक रचना की तुलना में इससे समाजी नजरिया बदलने में ज्यादा मदद मिली। इसने एक दिमागी भूकम्प पैदा कर दिया और डार्विन को मशहूर कर दिया।19।

नेहरू जी ने आगे लिखा कि आयर्लैंड में अंग्रेजों की दगाबाजी के रूप में लिमेरिक सबसे ज्यादा उभरा हुआ है। इसी दगाबाजी ने आयर्लैंड के चुने हुए नौजवान देश से बाहर चले गये र इंगलैंड से लड़ने वाले किसी भी देश की सेना में भरती हो गये। जहाँ कहीं अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई होती,ये आयरवासी वहां जरूर पहुँच जाते थे। लिमेरिक की इस सन्धि को अंग्रेजों नें आयर्लैंड में बसे अंग्रेजों जमीदार घरानों ने तोड़ दिया। ये प्रोटेस्टेण्ट घराने डबलिन की मातहती पार्लमेण्ट पर हावी थे। लिमेरिक में दिये गए गम्भीर वादे के बावजूद इन्होने कैथोलिकों को नागरिक या मज़हवी स्वतन्त्रता देने से इन्कार कर दिया और कैथोलिकों को सताने वाले,आय -र्लैंण्ड के ऊनी व्यापार को जान बूझकर बर्बाद करने वाले कानून बना दिया।20।

'गुलीवर्स ट्रैवल्स'का लेख जोनाथन स्विफ्ट इसी जमाने सन् 1667-1745ई0 में हुआ। इसने अपने देशवासियों को जो सलाह
दी थी,उससे अंग्रेजों के खिलाफ गुस्से का कुछ अन्दाजा लगाया जा सकता है,"इनके कोयले को छोड़कर बाकी हरेक अंग्रेजी सामान जला डालो!"डबलिन से सेण्ट पैट्रिक के गिरजे में जोनाथन स्विफ्ट की क़ब्र पर खुदा हुआ लेख इससे भी ज़्यादा कड़वा है। यह सायद उसी की कविता है- यहां दफ़न है शरीर, जोनाथन स्विफ्ट का, जो तीस वर्ष तक, इस बड़े गिरजे का डीन रहा, जहाँ बेइन्साफी़ के खि़लाफ़ वहशियाना गु़स्सा, अब उसका हृदय नहीं जला सकता। यात्री, जाओ और, हो सके तो, उसका अनुसरण करो, जिससे- मनुष्योचित करतव्य-पालन किया, स्वतन्त्रता की रક્ષા के लिए।21।

हिंदी का क्रेज बहुतायत पड़ोसी देशों में जहां बढ़ रहा है वहीं मलेशिया,इंडोनेशिया, सिंगापुर,चीन,रूस,जापान,अमेरिका,इंग्लैंड,
कनाडा,आँस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड,साउथ अफ्रीका आदि देशों में भी क्रेज बढ़रहा है। जो कार्य सरकारी संस्थान और सम्मेलन-गोष्ठियाँ नहीं कर पाई,वह कार्य वालीवुड और खवरिया ,एंटरटेनमेंट,टीवी चैनलों ने कर दिखाया है। विदेशों में तो हिंदी फिल्म देखते हुए लोग चैनलों के माध्म से भी हिंदी सीखी है। हिंदी का विकाश विश्व में वीसवीं शदी के अंतिम दो दशकों में ज्यादा हुआ। विश्व पटल पर जहां चीनी भाषा बोलने वाले अधिक बताए गये वहीं हिंदी लिखने वालों की संख्या चीन से ज्यादा है। यानी हिंद की अपेક્ષા चीनी भाषा का प्रयोग ક્ષેत्र कम है वहीं अंग्रेजी भाषा का अधिक बताया गया है।

 

 

 

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