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अंक: सितम्बर २०१७


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भाभी----गोविन्द सिंह वर्मा

 

जब से शहर में पढ़ाई के लिए आया था , तब से घर की बहुत याद आती थी । पढ़ाई की व्यस्तता के कारण बस तीज़ -त्योहारों पर घर जाने को मिलता था ।
उस दोपहर जब अचानक बाबूजी का फ़ोन आया तो मै आश्चर्य में पड़ गया । बाबूजी हमेंशा रात के खाने के पहले फ़ोन करते थे । खेर मैने फ़ोन उठाया । ' बेटा एक दो दिन के लिए घर आ जाओ - बाबूजी ने कहा। ह्रदय प्रसनता से भर गया । मैने कहा -जी बाबूजी जैसा आप कहें । परंतु अगले ही पल ख्याल आया की मेरी परीक्षाएं शुरू होने वाली है । 'बाबूजी मेरी परीक्षाएं होने वाली है , मै अबकी होली नही आ पाऊंगा ।' मैं बाबूजी के उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा । ' बेटा परीक्षा दे देना परंतु तुम घर आ जाओ - बाबूजी ने कहा तो ख़ुशी महसूस नही हुई । बाबूजी की आवाज़ साफ दिखा रही थी की कुछ बात जरूर थी । मन में ख्यालो का ताँता लग गया । समझ कुछ आ नही रहा था । बस अजीबोगरीब ख्याल आने लगे थे ।
शाम की बस से मै घर पहुच गया । हमेशा की भांति आज द्वार पर भाभी नही थी । मैं सकपका गया । अंदर जाकर देखा - भाभी एक पलंग पर लेटी हुई थी । उनका उड़ा हुआ रंग और माँ बाबूजी के आँसु सारी कहानी बया कर गए ।
'रमा देखों , कौन आया है - भैया ने कहा । भाभी ने आँखे खोली - एक पल मुझे देखा , हल्की सी मुस्कुराई और वापस आँखे बंद कर ली । हमेशा के लिए ।
घर मे सब रोने लगें । मेरी आँखों से एक कतरा भी नही बहा । बस कुछ पल बाद मै बेहोंश हो गया ।
भाभी और मेरे मध्य प्रेम देख कर गाँव की औरतो ने न जाने क्या क्या ख्याल पाल रखे थे । भाभी को मैं अपनी माँ की तरह प्रेम करता था । अपनी हर बात बताता था । उनकी गोद में सोता था । उनके कंधे पर सिर रख कर रोता था । उनको तंग करता था । उनके हाथों से खाना खाता था । भाभी भी मुझे लड़कियो के नाम से चिढ़ाती रहती थी । मैं शहर जाता तो हमेशा उन्हें याद करता । रोज शाम को उनसे बात करता था । भाभी मुझे अक्सर एक दो दिन को घर आने को बोलती रहती थी ।
दीवाली के समय भाभी की तबियत ख़राब थी , यह मुझे पता था परंतु मुझे यह खबर न थी की यह हो जायेगा ।
मैं अंदर से बिखर गया था । घर जाने का मन नही होता था । माँ बाबूजी पहले जैसे नही रहे थे । भैया का हाल मैं बता नही सकता । बस मैं अब कुछ न कुछ बहाना बनाकर शहर मैं ही रहता । बाबूजी बुलाते तो कुछ भी झूंठ बोल देता । मैं बस अब घर नही जाना चाहता था । घर मुझे काटता था ।
होली आने वाली थी । उस दोपहर को बाबूजी का फ़ोन आया । मुझे इस बार घर जाना ही पडा । बाबूजी वरना खुद शहर आने वाले थे । अगली सुबह बस से मैं गांव पहुच गया । घर सूना ही था परंतु एक सदस्य ज्यादा नज़र आया । एक युवती जो भाभी के सामान ही थी । मैंने माँ बाबूजी को प्रणाम किया और ऊपर जाने लगा तो भैया बोले - करण अपनी नई भाभी से बात नही करोगे ? मैंने उस युवती की और देखा और ऊपर चला गया ।
आँखों मैं आँसु आ गए । मैं भाभी को याद कर फुट फुट कर रोने लगा ।
मेरे कमरे मैं नई भाभी आई और मेरे बगल मे बैठ गई । मैं खड़ा हो गया । उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपने करीब बिठा लिया और अपने हाथों से मेरे आँसु पोंछे और बोली - मुझे भाभी नही कहोगे लल्ला ?
मैने एक पल उनकी आँखों में झाँका और उनके कंधे पर सिर रख दिया । भाभी मेरा सिर प्यार से सहलाने लगी । मेरे मुँह से अनायास ही भाभी निकला । भाभी ने मुझे अपने गले लगा लिया ।

 

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